जन्माष्टमी विशेष : हे नाथ नारायण वासुदेवाय

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संजय तिवारी
युगप्रवर्तक योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भारत में हर कहीं मनाया जाता है। मथुरा और वृन्दावन के मंदिरों की झाकिया तो प्रसिद्ध हैं ही , इस अवसर पर लोग अपने घरों में भी श्रीकृष्ण के जन्म की झांकी सजाते हैं और उत्सव मनाते हैं। देवताओं में भगवान श्री कृष्ण विष्णु के अकेले ऐसे अवतार हैं जिनके जीवन के हर पड़ाव के अलग रंग दिखाई देते हैं। जब भी असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया।

कालरात्रि , शिवरात्रि , मोहरात्रि ,अहोरात्रि
वेदों में चार रात्रियों का विशेष महातव्य बताया गया है। दीपावली को कालरात्रि कहते हैं, शिवरात्रि महारात्रि है,श्री कृष्ण जन्माष्टमी मोहरात्रि और होली अहोरात्रि है। मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। जन्माष्टमी का व्रत ‘व्रतराज’ कहा गया है। इसके विधिपूर्वक पालन से प्राणी अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाला महान पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

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भविष्य पुराण के जन्माष्टमी व्रत-माहात्म्य में यह कहा गया है कि जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सव किया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराज के अनुष्ठान से सभी को परम श्रेय की प्राप्ति होती है।

जप के मंत्र

जिन परिवारों में कलह-क्लेश के कारण अशांति का वातावरण हो, वहां घर के लोग जन्माष्टमी का व्रत करने के साथ इनमें से किसी भी मंत्र का अधिकाधिक जप करें-
‘ऊंँ नमो नारायणाय’
‘सिद्धार्थ: सिद्ध संकल्प: सिद्धिद सिद्धि: साधन:’
‘ऊँ नमों भगवते वासुदेवाय’
‘श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नम:॥’
‘श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय’

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत
कृष्ण जन्माष्टमी को कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्रीकृष्ण जयन्ती और श्री जयन्ती के नाम से भी जानते हैं। भक्त लोग जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात, भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर, अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के पश्चात व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं। कुछ कृष्ण-भक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र अथवा मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं। संकल्प प्रात:काल के समय लिया जाता है और संकल्प के साथ ही अहोरात्र का व्रत प्रारम्भ हो जाता है। जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है।

एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम जन्माष्टमी उपवास के दौरान भी पालन किये जाने चाहिये। अत: जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये। जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी के पारण समय से जाना जाता है।

उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रात:काल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्?पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश, द्रव्य दक्षिणा और गंध लेकर संकल्प करें-

ऊँ विष्णुॢवष्णुॢवष्णु:अद्य शर्वरी नाम संवत्सरे सूर्ये दक्षिणायने वर्षतरै भाद्रपद मासे कृष्णपक्षे श्रीकृष्ण जन्माष्टम्यां तिथौ भौम वासरे अमुकनामाहं (अमुक की जगह अपना नाम बोलें) मम चतुर्वर्ग सिद्धि द्वारा श्रीकृष्ण देवप्रीतये जन्माष्टमी व्रताङ्गत्वेन श्रीकृष्ण देवस्य यथामिलितोपचारै: पूजनं करिष्ये।
यदि उक्त मंत्र का प्रयोग व उच्चारण कठिन प्रतीत हो तो इस मंत्र का प्रयोग भी कर सकते हैं:
ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धयेश्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥

यदि संभव हो तो मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए ‘सूतिकागृहÓ नियत करें।
तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मी जी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमश: निर्दिष्ट करना चाहिए। अर्धरात्रि के समय शंख तथा घंटों के निनाद से श्रीकृष्ण जन्मोत्सव सम्पादित करें फिर श्रीविग्रह का षोडशोपचार विधि से पूजन करे।

इस मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें-
‘प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामन:।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नम:।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।’ 
उसके पश्चात सभी परिजनों में प्रसाद वितरण कर सपरिवार अन्न भोजन ग्रहण करें और संभव हो तो रात्रि जागरण करें। इसके अलावा कृष्ण जन्म के समय राम चरित मानस के बालकांड में रामजन्म प्रसंग का पाठ अथवा विष्णु सहस्त्रनाम, पुरुष सूक्त का पाठ भी सर्वस्य सिद्धि व सभी मनोरथ पूर्ण करने वाला है। जन्माष्टमी के दिन संतान गोपाल मंत्र, के जाप व हरिवंश पुराण, गीता के पाठ का भी बड़ा ही महत्व है। इस तिथि में सम्मोहन के प्रयोग सबसे ज्यादा सिद्ध किये जाते हैं।
श्रीकृष्ण के प्रभावी मंत्र

मूलमंत्र :’कृं कृष्णाय नम:’
‘ऊ श्रीं नम: श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा’
‘गोवल्लभाय स्वाहा’
‘गोकुल नाथाय नम:’
‘क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलांगाय नम:’
‘ऊँ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय’
‘ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविंदाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ह्सों।’
‘ऊँ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय श्रीं श्रीं श्री’
‘ऊँ नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’
‘लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड बालरूप मेघश्याम भगवन विष्णो स्वाहा।’
‘नन्दपुत्राय श्यामलांगाय बालवपुषे कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।’
‘ऊँ कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे। रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ में॥’

श्री कृष्ण जन्माष्टमी – 2 सितंबर 2018
निशिता पूजा का समय = 23:57 से 24:43 तक।
मध्यरात्रि का क्षण = 24:20
3 सितंबर को, पारण का समय = 20:05 के बाद
पारण के दिन अष्टमी तिथि के समाप्त होने का समय = 19:19
पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने का समय = 20:05

वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी
वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी, 3 सितंबर 2018
वैष्णव जन्माष्टमी के लिये अगले दिन का पारण समय = 06:04 (सूर्योदय के बाद)
पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएंगे।

 

 

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