आखिर क्यों शहरों में लोग नहीं कर रहे हैं सार्वजनिक वाहनों का उपयोग

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ऑटो क्षेत्र में जितनी तरक्की हुई है उतनी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में नहीं हुई है। जिसकी वजह से यात्री बसों को छोड़कर दुपहिया वाहन या फिर कारें खरीद रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या हर साल गिरती जा रही है। हर साल परिस्थिति बद से बदतर हो रही है। 1994 की बात करें तो उस समय मुख्य शहरों में 60-80 प्रतिशत यात्री सार्वजनिक परिवहनों का प्रयोग करते थे। वहीं 2018 में यह संख्या 25-35 प्रतिशत घट गई है।

इस गिरावट के लिए शहरों के बस ढांचे जिम्मेदार हैं क्योंकि पिछले चार सालों में बसों की संख्या में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। इसके मुकाबले दुपहिया और चार पहिया वाहनों की जनसंख्या में काफी बढ़त हुई है जिसकी वजह से शहरी सड़कों पर भीड़ हो गई है। वहीं पिछले 10-15 सालों में दिल्ली, बंगलूरू, मुंबई, जयपुर और लखनऊ जैसे शहरों में मेट्रो का निर्माण कार्य हुआ है।

ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म एटी कीरने के एक शोध के अनुसार दुपहिया और चार पहिया वाहनों की संख्या में 2014-17 के बीच सालाना 8-10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस शोध में कहा गया है, बसों के बेड़े में आई नकारात्मक वृद्धि की वजह से औसतन लोग दुपहिया वाहनों और कारों की तरफ खींचे चले जाते हैं। इस मामले पर शहरी विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक परिवहन के यात्रियों में आई यह कमी हैरानी वाली बात नहीं बल्कि खतरे की घंटी है।

एक सरकारी अधिकारी ने कहा, कार या दुपहिया वाहन आपको इस इस चीज की छूट देता है कि वह अपने घर से सीधे दफ्तर जा सके। सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने के लिए न तो कोई प्रोत्साहन हैं और ना ही निजी वाहनों का उपयोग करने के लिए भारी पार्किंग उच्च पंजीकरण शुल्क जैसे निरुत्साही कदम। जिसके कारण बहुत सारी बसें गैर उपयोग के पड़ी हुई हैं। 19 लाख पंजीकृत बसों में से केवल 1.4 लाख बसे राज्य परिवहन विभाग के पास हैं। बाकी की 90 प्रतिशत बसों को निजी मालिक और शैक्षणिक संस्थान चलाते हैं।

Source: Purvanchal media