पर्व : हरतालिका तीज व गणेश चतुर्थी

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लखनऊ : बारह सितम्बर को हिन्दू धर्म के दो बड़े त्योहार पड़ रहे हैं। इस दिन हरतालिका तीज का व्रत है। यह व्रत करने वाली महिलाएं भगवान शिव और पार्वती से सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद मानती हैं। माना जाता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए किया था। इस बार हरतालिका तीज 12 सितंबर को मनाई जाएगी। इसी दिन भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाएगा। अब देश में गणेशोत्सव का त्योहार व्यापक रूप से मनाया जाने लगा है। पहले इस गणेशोत्सव का ज्यादा चलन महाराष्ट में ही था मगर अब यह उत्तर भारत में भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों व सार्वजनिक जगहों पर भगवान गणेश की प्रतिमा की स्थापना करके उनकी पूजा करते हैं और अपने सारे कार्य बिना किसी विघ्र बाधा के पूरा करने का आशीर्वाद मांगते हैं।

हरतालिका तीज
हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता है। यह त्योहार भादो की शुक्ल तीज को मनाया जाता है। इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते हैं। यह आमतौर पर अगस्त-सितम्बर महीने में ही आती है। इस वर्ष यह त्योहार 12 सितम्बर को मनाया जाएगा। हरियाली तीज, कजरी तीज और करवा चौथ की तरह ही हरतालिका तीज भी सुहागिनों का व्रत होता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं और भगवान शिव और पार्वती से सदा सुहागन का आशीर्वाद मांगती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए किया था। इसलिए यह कहा जाता है कि माता पार्वती की तरह अच्छा वर प्राप्त करने के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को रख सकती हैं। माता गौरी के पार्वती रूप में वे शिव जी को पति रूप में चाहती थी जिसके लिए उन्होंने कठिन तपस्या की थी। उस समय पार्वती की सहेलियों ने उन्हें अगवा कर लिया था। इस कारण इस व्रत को हरतालिका कहा गया हैं क्योंकि हरत मतलब अगवा करना तथा आलिका मतलब सहेली अर्थात सहेलियों द्वारा अपहरण करना हरतालिका कहलाता है।

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व्रत के नियम
हरतालिका व्रत निर्जला किया जाता है अर्थात अगले सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता।
ये व्रत कुंवारी कन्याओं व सौभाग्यवती महिलाएं करती हैं। इसे विधवा महिलाएं भी कर सकती हैं।
व्रत का नियम है कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।
हरतालिका व्रत पर रतजगा किया जाता है। पूरी रात महिलाएं एकत्र होकर नाच, गाना एवं भजन करती हैं। नये वस्त्र पहनकर पूरा शृंगार करती हैं।

पूजन विधि
हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय।
पूजन के लिए शिव, पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती है।
फुलेरा बनाकर उसे सजाया जाता है। उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर पटरा अथवा चौकी रखी जाती है। चौकी पर एक सातिया बनाकर उस पर थाल रखते हैं, उस थाल में केले के पत्ता रखा जाता है।
तीनों प्रतिमाओं को केले के पत्ते पर आसीन किया जाता है। सर्वप्रथम कलश बनाया जाता है और फिर उस पर श्रीफल अथवा एक दीपक जलाकर रखते हैं।

कलश का पूजन किया जाता है। कलश के बाद गणेश जी, शिव जी फिर माता गौरी की पूजा की जातीहै। उन्हें सम्पूर्ण शृंगार चढ़ाया जाता है। इसके बाद हरतालिका की कथा पढ़ी जाती है। फिर सभी मिलकर आरती करते हैं जिसमे सर्प्रथम गणेश जी की आरती, फिर शिव जी की आरती और फिर माता गौरी की आरती की जाती है।
पूजा के बाद भगवान की परिक्रमा की जाती है। रात भर जागकर पांच पूजा एवं आरती की जाती है।सुबह आखिरी पूजा के बाद माता गौरा को जो सिंदूर चढ़ाया जाता है उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं।ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोड़ा जाता है। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुंड में विसर्जित किया जाता है।

हरतालिका तीज व्रत कथा
शिव जी ने माता पार्वती को विस्तार से इस व्रत का महत्व समझाया है । माता गौरा ने सती होने के बाद हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। बचपन से ही पार्वती भगवान शिव को वर के रूप में चाहती थी, जिसके लिए पार्वती जी ने कठोर तप किया। उन्होंने कंपाने वाली ठंड में पानी में खड़े रहकर व गर्मी में यज्ञ के सामने बैठकर यज्ञ किया। बारिश में जल में रहकर कठोर तपस्या भी की। बारह वर्षों तक निराहार पत्तों को खाकर पार्वती जी ने व्रत किया। उनकी इस निष्ठा से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने हिमालय से पार्वती जी का हाथ विवाह हेतु मांगा जिससे हिमालय बहुत प्रसन्न हुए और पार्वती को विवाह की बात बताई, जिससे पार्वती दुखी हो गईं और अपनी व्यथा सखी से कही और जीवन त्याग देने की बात कहने लगी। इस पर सखी ने कहा कि यह वक्त ऐसी सोच का नहीं हैं और सखी पार्वती को हरकर वन में ले गई जहां पार्वती ने छिपकर तपस्या की। फिर पार्वती को शिव ने आशीर्वाद दिया और पति रूप में मिलने का वर दिया। हिमालय ने बहुत खोजा पर पार्वती नहीं मिलीं। बहुत वक्त बाद जब पार्वती मिलीं तब हिमालय ने इस दुख एवं तपस्या का कारण पूछा। तब पार्वती ने अपने दिल की बात पिता से कही, इसके बाद पुत्री हठ के कारण पिता हिमालय ने पार्वती का विवाह शिव जी से तय किया। इस प्रकार से सती अर्थात पार्वती जी को शिव जी पुन: सुहाग के रूप में प्राप्त हुए।

हरतालिका तीज का मुहूर्त
इस बार हरतालिका तीज 12 सितंबर को मनाई जाएगी। इस बार प्रात:काल पूजन के लिए महिलाओं को सिर्फ 2 घंटे 29 मिनट का समय मिलेगा। प्रात:काल मुहूर्त सुबह 06:04:17 से 08:33:31 बजे तक है।

गणेश चतुर्थी, विनायक चतुर्थी या गणेश चौथ

 

गणेश चतुर्थी, विनायक चतुर्थी या गणेश चौथ

भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सवअनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालुबड़े ही धूमधाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणेश चतुर्थी पूजा मुहूर्त
मध्याह्न गणेश पूजा का समय : 11:09 से 13:35
12 सितम्बर को चन्द्रमा को नहीं देखने का समय : 16:07 से 20:42
13 सितंबर को चन्द्रमा को नहीं देखने का समय : 09:33 से 21:23
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ : 12 सितम्बर/2018 को 16:07 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त : 13 सितम्बर/2018 को 14:51 बजे

गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त
माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था। इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। हिन्दू दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है। हिन्दू समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पांच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश स्थापना और गणेश पूजा मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिए। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है।

गणेश चतुर्थी परचन्द्र दर्शननिषिद्ध
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रदर्शन वर्जित होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है।पौराणिक गाथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देखकर नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।

नारद ने भगवान कृष्ण को बताया कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जाएगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जाएगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिए गणेश चतुर्थी का व्रत किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गए।

मिथ्या दोष निवारण मंत्र
चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिए वर्जित हो सकता है। धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है। इसी नियम के अनुसार चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा का दर्शन चन्द्रास्त तक वज्र्य होता है। अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जाएं तो मिथ्या दोष से बचाव के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए-

सिंह: प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक:॥

पूजा विधि, रस्में और महत्व
गणेश चतुर्थी पर घरों या सार्वजनिक स्थानों पर गणेश प्रतिमा स्थापित करने का चलन है। प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठïा के लिए लोग खासतौर पर लाल सिल्क की धोती और शाल पहनकर पूजा करते हैं। भगवान को मूर्ति में बुलाने के लिए पुजारी मंत्रों का जाप करते है। लोग नारियल, 21 मोदक, 21 दूव-घास, लाल फूल, मिठाई, गुड़, धूप बत्ती, माला आदि की भेंट चढ़ाते हैं। सबसे पहले लोग मूर्ति पर कुमकुम और चंदन का लेप लगाते हैं और पूजा के सभी दिनों में वैदिक भजन और मंत्रों का जाप, गणपति अथर्व संहिता, गणपति स्त्रोत और भक्ति के गीत गाकर भेंट अर्पित करते हैं।,


दस दिनों की पूजा
गणेश पूजा भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी से शुरू होती है और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होती है। 11 वें दिन गणेश विसर्जन नृत्य और गायन के साथ सड़क पर एक जुलूस के माध्यम से किया जाता है। लोग भगवान से अगले साल फिर आने की प्रार्थना करते हैं। मूर्ति को पानी में विसर्जित करते समय भगवान से पूरे साल उनके अच्छे और समृद्धि के लिये प्रार्थना की जाती है। विसर्जन के दौरान फूल, माला, नारियल, कपूर और मिठाई अर्पित करते हैं।

प्रसाद में मोदक
भगवान को खुश करने के लिए उन्हें मोदक भेंट करते हैं क्योंकि गणेश जी को मोदक बहुत प्रिय है। ये माना जाता है कि इस दिन पूरी भक्ति से प्रार्थना करने से आन्तरिक आध्यात्मिक मजबूती, समृद्धि, बाधाओं का नाश और सभी इच्छाओं की प्राप्ति होती है। ये विश्वास किया जाता है कि पहले व्यक्ति जिसने गणेश चतुर्थी का उपवास रखा था वे चन्द्र (चन्द्रमा) थे। एकबार, गणेश स्वर्ग की यात्रा कर रहे थे तभी वो चन्द्रमा से मिले। उसे अपनी सुन्दरता पर बहुत घमण्ड था और वो गणेश जी की भिन्न आकृति को देखकर हंस पड़ा। तब गणेश जी ने उसे श्राप दे दिया। चन्द्रमा बहुत उदास हो गया और गणेश से उसे माफ करने की प्रार्थना की। अन्त में भगवान गणेश ने उसे श्राप से मुक्त होने के लिये पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ गणेश चतुर्थी का व्रत रखने की सलाह दी।

स्वतंत्रता संग्राम और गणेशोत्सव
वीर सावरकर और कवि गोविंद ने नासिक में ‘मित्रमेला’ संस्था बनाई थी। इस संस्था का काम था देशभक्तिपूर्ण पोवाडे (मराठी लोकगीतों का एक प्रकार) आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना। इस संस्था के पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्टï में धूम मचा दी थी। कवि गोविंद को सुनने के लिए लोगों उमड़ पड़ते थे। राम-रावण कथा के आधार पर वे लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे। उनके बारे में वीर सावरकर ने लिखा है कि कवि गोविंद अपनी कविता की अमर छाप जनमानस पर छोड़ जाते थे। गणेशोत्सव का उपयोग आजादी की लड़ाई के लिए किए जाने की बात पूरे महाराष्टï में फैल गयी। बाद में नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में भी गणेशोत्सव ने आजादी का नया ही आंदोलन छेड़ दिया था। अंग्रेज भी इससे घबरा गए थे। इस बारे में रोलेट समिति रपट में भी चिंता जतायी गयी थी। रपट में कहा गया था गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर अंग्रेजी शासन विरोधी गीत गाती हैं व स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने और मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। साथ ही अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक संघर्ष को जरूरी बताया जाता है। गणेशोत्सवों में भाषण देने वाले में प्रमुख राष्ट्रीय नेता थे- वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, पंडित मदन मोहन मालवीय, मौलिकचंद्र शर्मा, बैरिस्ट चक्रवर्ती, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू।

गणेश विसर्जन
गणेश चतुर्थी के त्योहार के 11वें दिन गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन होता है। गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी पर किया जाने वाला अनुष्ठान समारोह है। इस बार गणेश विसर्जन 22 सितंबर को किया जाएगा। कुछ लोग अनंत चतुर्दशी से कुछ दिनों पहले गणेश विसर्जन करते हैं। कुछ लोग गणेश चतुर्थी के अगले दिन गणेश विसर्जन करते हैं। हालांकि कुछ लोग गणेश चतुर्थी के बाद 3, 5, 7, 10 वें और 11 वें दिन पर भी गणेश विसर्जन करते हैं।
रीति रिवाजों और परंपराओं के अनुसार 2018 में गणपति विसर्जन तिथियांइस प्रकार हैं-
13 सितंबर, 2018 को गणेश विसर्जन डेढ़ दिन पर होगा।
14 सितंबर, 2018 को गणेश विसर्जन तीसरे दिन होगा।
16 सितंबर, 2018 को गणेश विसर्जन 5 वें दिन होगा।
18 सितंबर, 2018 को गणेश विसर्जन 7 वें दिन होगा।
10 वें दिन गणेश विसर्जन 21 सितंबर, 2018 को होगा।
11 वें दिन (अनंत चतुर्दशी) गणेश विसर्जन 22 सितंबर, 2018 को होगा।

गणेश विसर्जन का महत्व
गणेश विसर्जन हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखता है। गणेश जी की मूर्ति मिट्टी की बनी होती है जो पानी में विसर्जित होने के बाद बेडौल हो जाती है। इसका मतलब है कि इस दुनिया में सबकुछ एक दिन (मोक्ष या मुक्ति) बेडौल हो जाएगा। गठन और बेडोल होने की प्रक्रिया कभी न खत्म होने वाला घेरा (अर्थात चक्र) है। हर साल गणेश जीवन के इसी परम सत्य के बारे में हमें यकीन दिलाने के लिए आते हैं।
भगवान गणेश का मंत्र
ऊँ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा।।

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