एससी-एसटी एक्ट संशोधन के बारे में लोगों को नहीं सही जानकारी

National

एससी/एसटी एक्ट पर सवर्णों के आंदोलन पर अमर उजाला ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद्र गहलोत से खास बातचीत की।  संपादक ने एससी/एसटी एक्ट पर एनडीए सरकार की मंशा और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाने के पीछे की वजह जानने की कोशिश की। पेश है इस साक्षात्कार के कुछ अंश-

सवाल- अचानक से देश में सवाल उठने लगे हैं क्या मोदी सरकार सवर्णों के साथ अन्याय कर रही है? सुप्रीम कोर्ट के एससी/एसटी एक्ट में दखल को अनदेखा कर संशोधन लाना…चूंकि आप इस मसले से सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं तो बतायें क्या इस कानून को लेकर सरकार ने क्या कोई गलती कर दी है? या अधिनियम को समझने में चूक हुई है? या ये मामला पूरी तरह से राजनैतिक है?

जवाब– सर्व समाज के सभी माननीय सदस्यों ने सर्वानुमति से इस विधेयक को पारित किया है। इस विधेयक में 1989 में जो प्रस्ताव पारित हुआ था और 1990 से जो लागू हुआ वही प्रावधान है,कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। केवल धारा 18 की माननीय उच्चतम न्यायालय ने जो व्याख्या की थी और उसमें जो कुछ निर्देशात्मक परिवर्तन दर्शाये थे उसके स्पष्टीकरण के लिए हमने प्रावधान किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था अगर कोई एफआईआर दर्ज कराने एससी/एसटी जाति का व्यक्ति आता है तो एफआईआर दर्ज करने के बजाय किसी एसपी रैंक के अधिकारी से उसकी जांच करा ली जाये।जांच में यदि तथ्य पायें जाये तो फिर एफआईआर दर्ज की जाये। इसके साथ-साथ ये भी कहा था कि एफआईआर दर्ज होने के उपरांत अगर गिरफ्तारी करनी हो तो ,सामान्य नागरिक अगर अपराधी है तो एसएसपी के अनुमति से और सरकारी अधिकारी है तो नियुक्ति करने वाले अधिकारी के अनुमति से की जाये।

इसके कारण न्याय सिद्धांत प्रभावित हो रहा था, शीघ्र न्याय,सुलभ न्याय और सस्ता न्याय मिलने में दिक्कत आती । इससे अपराधी को संरक्षण मिलता और पीड़ित परिवार को जो राहत मिलनी चाहिए उसमे दिक्कत आती और विलंब होता।

पहले ये प्रावधान था कि कोई भी एफआईआर दर्ज कराएगा तो एफआईआर दर्ज होगी और उस थाने का डीएसपी उसकी जांच करेगा।गिरफ्तारी की कार्रवाई करेगा और इसके लिए किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी।इसी प्रकार का प्रावधान भारतीय दंड संहिता प्रक्रिया में भी है। अब अलग से ये प्रावधान होने से पुलिस कार्रवाई में भी हस्तक्षेप होता,जैसे मध्य प्रदेश में एसएसपी की पोस्ट भोपाल,इंदौर और ग्वालियर में है…बाकी जगह नहीं है तो कठिनाई होती…

सवाल- लेकिन डीआईजी रैंक का कोई अधिकारी को भी जिम्मेदारी ले सकता था।

जवाब- हां…तो डीआईजी रैंक के अफसर के पास फाइल जाती फिर इसमें भी वक्त लगता, फिर जैसा की आप जानते हैं कि अपॉयंटिंग अथॉरिटी चतुर्थ श्रेणी की नियुक्ति भी आयुक्त और डाइरेक्टर स्तर के अधिकारी होते हैं। उनसे अनुमति लेने के लिए अगर पुलिस लिखती तो वो कहते कि ‘मैं इस मामले की केस डायरी देखूंगा फिर बता सकूंगा कि ये आरोपी गिरफ्तारी के योग्य है या नहीं।’

इस प्रक्रिया के लिए अधिकारी फाइल अपने पास मंगवाता तो पुलिस की जांच में भी हस्तक्षेप होता और बहुत विलंब होता इसलिए ये निर्णय सरकार ने लिया कि एफआईआर करने के लिए किसी प्रकार की प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं होगी। एफआईआर दर्ज कर ली जाएगी और प्रक्रिया होने के बाद संबंधित थाना अधिकारी या सब इंसपेक्टर या एसआई या जो भी हो वो इंवेस्टिगेशन करेगा।

जांच के बाद अगर अपराध गंभीर तौर पर सही पाया गया तो आवश्यक पड़ने पर गिरफ्तारी होगी, ये प्रावधान हमने किया है।अभी जो वातावरण बना है,हमने जो सुधार किया है या संशोधन किया है उसकी सही जानकारी लोगों तक नहीं पहुंची है।

Source: Purvanchal media