बिल्कुल अलग है यहां का मोहर्रम चांद होते ही महिलाएं तोड़ देती हैं अपनी चूड़ियां

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बिल्कुल अलग है सिद्धार्थनगर के हल्लौर का मोहर्रम, चाँद होते ही महिलाएं तोड़ देती हैं चूड़ियां
मोहर्रम प्रारम्भ हो गया है दुनिया भर में शिया-सुन्नी मुसलमान मोहर्रम का त्यौहार स्थानीय परम्परा के अनुसार मनाते हैं। भारत में भी बड़ी संख्या में लोग मोहर्रम का त्यौहार प्रमुखता से मनाते हैं जिनमे मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं की भागीदारी लगभग बराबर की रहती है। अलग अलग शहरों, कस्बों, और प्रान्तों में लोग मोहर्रम अलग अलग तरीकों से मनाते हैं। इसी क्रम में हम बात कर रहे हैं पुर्वांचल के सिद्धार्थनगर जनपद के हल्लौर कस्बे की जहां का मोहर्रम दुनिया भर में अपनी पृथक पहचान रखता है।
*बिल्कुल अलग दिखता है हल्लौर का ताज़िया*

मोहर्रम के नौवें दिन हल्लौर चौक पर रखा जाने वाला बड़ा ताज़िया पूरे जनपद के लोगो को आकर्षित करता है। स्थानीय ताज़ियादार (ताज़िया बनाने वाले कलाकार) इंडो-पर्शियन आर्ट की मदद से बांस की तीली और पेपर पर अपनी कला का अद्भड़ नज़ारा पेश करते हैं। पेपरों की बारीक कटिंग और ज्यामितीय कला के माध्यम बनी डिज़ाइन से यहां के ताजिया अन्य शहरों से बिल्कुल अलग दिखता है। इन ताजियों की ऊँचाई लगभग 30 आए 35 फिट तक होती है और यह ताज़िया कस्बे के मध्य बने चौक पर रख जाता है जहां सैकड़ों गाओं और कस्बो से लोग दर्शन करने हल्लौर पहुंचते हैं।
*मोहर्रम का चाँद दिखते ही महिलाएं तोड़ देती हैं सुहाग की चूड़िया*
मोहर्रम का चांद दिखते ही महिलांए अपने सुहाग की चूड़ियां इन्ही चबूतरों पर तोड़ देती है जिनपर हज़रत इमाम हुसैन का ताज़िया रखा जाता है। इन महिलाओं का कहना है कि जब मोहर्रम महीने में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद के परिवार की महिलाओं का ही सुहाग सुरक्षित नही रहा तो हम चूड़ियां कैसे पहन सकते हैं। चांद होने से लेकर लगभग 2 महीने तक ये महिलांए साज, सज्जा, श्रृंगार, चूड़ी और आभूषणों का प्रयोग बिल्कुल नही करती बल्कि 2 महीने हज़रत इमाम हुसैन की शहादत को याद कर उनके शोक में डूब जाती हैं पूरा कस्बा 2 महीने तक शोकाकुल रहता है और कोई भी शुभ कार्य नही किया जाता ।

Source: Gorakhpur times
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बिल्कुल अलग है यहां का मोहर्रम चांद होते ही महिलाएं तोड़ देती हैं अपनी चूड़ियां