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भीमा-कोरेगांव हिंसा; महाराष्ट्र में स्कूल बंद

अब हंगामों पर आज की दूसरी सबसे बड़ी ख़बर  हंगामा सिर्फ राज्यसभा में ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र की सड़कों पर भी हो रहा था महाराष्ट्र में पुणे के पास भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा को लेकर आज दलित संगठनों ने बंद का आह्वान किया था महाराष्ट्र के कई जिलों में आज इस बंद  हंगामे का प्रभाव देखने को मिला इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मुंबई पर हुआ बंद की वजह से पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो गई  स्कूल बंद करने पड़े लोगों का काम-धंधा चौपट हो गया गरीब आदमी का नुकसान हुआ  लोगों को बहुत तकलीफ हुई इस बंद की वजह से पूरे महाराष्ट्र में अकेले ट्रांसपोर्ट सेक्टर में ही 2 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है सोचिए अगर सभी विभागों में हुए नुकसान का अनुमान लगाया जाए तो ये आंकड़ा कितना बड़ा होगा

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ये दशा पैदा करने का आरोप एक बार फिर अफजल प्रेमी गैंग पर लग रहा है कोरेगांव हिंसा से पहले 31 दिसंबर को एक प्रोग्राम का आयोजन किया गया था इस प्रोग्राम में 200 साल पहले हुए कोरेगांव युद्ध को याद किया गया हमने आपको कल (2 जनवरी) को भी बताया था कि कैसे अफजल प्रेमी गैंग भी इस आयोजन में सक्रिय था  जब हमने इस पूरे मामले की छानबीन की  तो उसमें भी हमें अफज़ल प्रेमी गैंग के राजनीतिक निशान मिले

भारत विरोधी नारे लगाने वाला जेएनयू का विद्यार्थी नेता उमर खालिद इस प्रोग्राम के मंच पर मौजूद था  उसके साथ राहुल गांधी के दोस्त  गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी भी थे इन दोनों के विरूद्ध पुणे के Deccan पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज की गई है इस शिकायत में बोला गया है कि उमर खालिद  जिग्नेश मेवाणी ने भड़काऊ बयान दिए जिग्नेश मेवाणी के सम्बोधन से दो समुदायों के बीच तनाव फैला उन्होंने लोगों से सड़कों पर उतरने के लिए बोला था  इसकी वजह से ही तनाव फैल गया

इस शिकायत में इन दोनों पर IPC की धारा 153 A  धारा 505 के तहत मामला दर्ज करने की मांग की गई है आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि IPC की धारा 153 A में धर्म, जाति, नस्ल भाषा के आधार पर भड़काने का मामला दर्ज किया जाता है वहीं धारा 505 में किसी समुदाय या वर्ग के विरूद्ध अफ़वाह फैलाने  दो समुदायों के बीच दुश्मनी पैदा करने का मामला दर्ज किया जाता हैजिग्नेश मेवाणी गुजरात विधानसभा के सदस्य हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह का बयान दिया है उससे लगता है कि उनका भरोसा लोकतंत्र की व्यवस्थाओं पर कम है   वो सड़कों पर उतरकर क्रांति करना चाहते हैं

देश को आज़ाद हुए 70 साल बीत चुके हैं लेकिन दलित समाज को सिर्फ़ एक वोट बैंक की तरह ही प्रयोग किया गया दलितों से विकास का वादा किया गया दलितों से वोट लिये गये  लेकिन कभी उनकी स्थिति सुधारने के लिए कोई गंभीर पहल नहीं की गई दलित वोटों की बदौलत ही कांग्रेस पार्टी ने बहुत लंबे वक्त तक राष्ट्र पर राज किया इसके बाद राष्ट्र के कई राज्यों में जाति की पॉलिटिक्स करने वाली पार्टियों का जन्म हुआ खासतौर पर यूपी  बिहार में जाति की पॉलिटिक्सबहुत ज़्यादा देखने को मिली कई नेताओं ने खुद को दलितों का मसीहा भी घोषित कर दिया लेकिन ज़मीनी स्तर पर दशा नहीं बदले

दलितों के हितों के नाम पर हमारे राष्ट्र में कई राजनीतिक दल बने   इन राजनीतिक पार्टियों के ज़्यादातर बड़े नेताओं ने दलितों की पॉलिटिक्स करते हुए अपने लिए बड़े बड़े बंगले बना लिए  ये लोग बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं  इन्होंने अपनी तिजोरियां भर ली हैं  धन-संपत्ति के भंडार लगा लिए इन नेताओं ने अपने परिवार के लोगों को पॉलिटिक्स  ब्यूरोक्रेसी में अच्छी तरह से फिट कर लिया कुल मिलाकर दलितों की पॉलिटिक्स के नाम पर ऐसे नेताओं ने सिर्फ अपने परिवार का उत्थान किया  बाकी बचे दलितों का सिर्फ  वोट लेने के लिए प्रयोग किया
आज भी राष्ट्र के बहुत सारे इलाकों में दलितों को अपमानित ज़िंदगी बिताना पड़ता है कुछ सालपहले मानवाधिकार आयोग ने दलितों की स्थिति पर एक ऐतिहासिक रिपोर्ट पेश की थी जिसके आंकड़े बहुत परेशान करने वाले थे

इस रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में हर 18 मिनट में एक दलित के साथ क्राइम की घटना होती है, हर रोज़  3 दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार होता है, हर रोज़ 2 दलितों की मर्डर की जाती है, हर रोज़ दो दलितों के घर जलाए जाते हैं, हर सप्ताह 6 दलितों का अपहरण किया जाता है, राष्ट्र में 37 फीसदीदलित गरीबी रेखा के नीचे ज़िंदगी जी रहे हैं, 54 फीसदी दलित बच्चे कुपोषित हैं, 45 फीसदी दलित पढ़ना-लिखना नहीं जानते हैं, एक तिहाई दलित परिवारों के पास जीने के लिए ज़रूरी मौलिक सुविधाएं भी नहीं हैं, 37 फीसदी सरकारी स्कूलों में दलित बच्चे  खाना खाने के लिए अलग बैठते हैं  48 फीसदी गांवों में दलितों को कुओं  हैंडपंप के पास जाने से रोका जाता है

यहां नोट करने वाली बात ये है कि राष्ट्र की आबादी में दलितों की संख्या 16.63% है यानी 100 में से 17 हिंदुस्तानी दलित हैं महाराष्ट्र में दलित आबादी 10.5% है   यही इस पॉलिटिक्स की एक बड़ी वजह है

जब राष्ट्र आज़ाद हुआ तो गवर्नमेंट के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी दलितों की स्थिति को सुधारनाक्योंकि लंबे समय से दलितों का उत्पीड़न किया जा रहा था दलितों की स्थिति सुधारने के लिए आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई ताकि उन्हें भी सरकारी नौकरियां मिल सकें आरक्षण की ये व्यवस्था बीते 70 सालों से चल रही है लेकिन इसके बाद भी दलितों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है इसकी वजह है आरक्षण व्यवस्था की कुछ कमियां जब भी इन कमियों की तरफ उंगली उठाई जाती है  तो इस पर कोई गंभीर चिंतन नहीं होता बल्कि पॉलिटिक्स प्रारम्भ हो जाती है

महाराष्ट्र से भाजपा के राज्यसभा सांसद चिकित्सक विकास महात्मे ने आरक्षण व्यवस्था की खामियों पर संसद में चर्चा की मांग की है उन्होंने सांसदों को एक Booklet बांटी है ये 37 पन्नों की एक पुस्तक है जिसमें ना तो आरक्षण का विरोध किया गया है  ना ही आरक्षण कोटे में कोई परिवर्तन करने की बात कही गई है इस किताब में आरक्षण की खामियों को दूर करने की मांग की गई है  एक Formula बताया गया है जिससे दलित  पिछड़े समाज से ताल्लुक रखने वाले हर आदमी को आरक्षण का लाभ मिल सके

डॉक्टर विकास महात्मे के मुताबिक आज़ादी के 70 साल बाद भी आरक्षण का लाभ महज़ 10 फीसदीलोगों को ही मिल रहा है बाकी के 90 फीसदी लोग आज भी सामाजिक  आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए हैं इसकी बड़ी वजह ये है कि जब एक परिवार को आरक्षण के माध्यम से सरकारी जॉब मिल जाती है तो उसके बाद उसी परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का फायदा उठाते रहते हैं  बाकी लोगों को इसका फायदा नहीं मिल पाता है आरक्षण व्यवस्था में सुधार के लिए इस किताब में 11 सुझाव दिए गए हैं इन सुझावों में पिछड़े समाज के उन लोगों को ज़्यादा महत्व देने की बात कही गई है जिन्हें आरक्षण का फायदा अब तक नहीं मिला है

उदाहरण के लिए अगर कोई आदमी एक बार किसी आरक्षित सीट से चुनाव जीत चुका है तो उसे दोबारा आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का फायदा नहीं मिलना चाहिए उसकी स्थान पिछड़े समाज के ही किसी दूसरे आदमी को मौका मिलना चाहिए इसी तरह इस किताब में ये सुझाव भी दिया गया है कि दलितों  पिछड़े वर्ग के लोगों में भी  आरक्षण के लिए ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जाए जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत ज़्यादा बेकार हो साथ ही दलित महिलाओँ को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता मिले इसके अतिरिक्त जिस आदमी के माता या पिता में से किसी एक की मृत्यु हो गई है या फिर दोनों की मृत्यु हो गई है ऐसे लोगों को नौकरियों में प्राथमिकता दी जाए

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Source: Purvanchal media