उत्तर प्रदेश में कड़ाके की ठंड पर अपनी जान पर खेलकर पुलिसकर्मी दे रहे हैं 24 घंटे की ड्यूटी,सरकार कब समझेगी इन का दर्द??

Viral

उत्तर प्रदेश में कड़ाके की ठंड पड़ रही है और इस कड़ाके की ठंड में 24 घंटे की ड्यूटी को पूर्ण रुप से निर्वहन करने का कार्य उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा किया जा रहा है और इस भीषण ठंड में अपने परिवार से दूर कठिन तपस्या करते हुए यूपी पुलिस पर कुछ जगहों पर आधी रात का सच दिखाया जा रहा है।।इस संदर्भ में गोरखपुर टाइम्स के द्वारा कड़ाके की ठंड में अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे पुलिसकर्मियों से उनका दर्द जानना चाहा तो तस्वीरें दिल को झकझोरने वाली निकली, बांसगांव क्षेत्र के अंतर्गत जब गोरखपुर टाइम्स के संवाददाता द्वारा रियल्टी चेक किया गया तो यह पाया गया कि मात्र चंद कपड़ों के बल पर दो सिपाही अपनी जान को दांव पर रखकर भीषण ठंड में पहरा दे रहे हैं, गस्त लगाने के दौरान जब संवाददाता ने इन होनहारों से बात की तो उन्होंने बताया हमने नौकरी के दौरान जो शपथ पत्र भरा था उसका निर्वहन कर रहे हैं और अगर हम ही सुस्त पड़ जाएंगे तो आम जन जीवन की सुरक्षा कौन करेगा।।।एक हवलदार ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि हम 24 घंटे की ड्यूटी करते हैं अपने परिवार से दूर रहकर आम जनमानस को ही परिवार समझकर उनकी सेवा करते हैं,18 घंटे की ड्यूटी करने के बाद अगर आधे घंटे के लिए हम कुर्सी पर ही विश्राम कर ले तो कुछ अराजक तत्वों द्वारा तस्वीरें खींच ली जाती हैं और हमारी सारी कर्तव्य निष्ठा को धूमिल कर दिया जाता है और कोई यह नहीं पूछता है कि आखिर आधे घंटे की नींद उस व्यक्ति ने कितने घंटो की तपस्या के बाद ली थी।।इस संबंध में पडरौना के थानाध्यक्ष इस्पेक्टर डॉक्टर विनय राय से जब हमने बात की तो उन्होंने हमें बताया कि समाज में पुलिस के प्रचलित इमेज जो भी हो परंतु पुलिस प्रशासन जिस विकट परिस्थितियों में कार्य करती है उसको अगर जनता समझे तो लोगों में एक अलग समझ जगेगी।। पुलिस प्रशासन को साप्ताहिक अवकाश नहीं प्राप्त होता है ना ही किसी त्यौहार में किसी अवकाश का प्रावधान है। ऐसे में लगातार घंटों की ड्यूटी देने के बाद अगर थोड़ी देर आंख लग जाए तो लोक आधी रात का सच दिखाने लगते हैं जो कि कहीं ना कहीं हमारे मनोबल को तोड़ने का कार्य करता है।।बहरहाल इस कड़ाके की ठंड में जिस प्रकार से पुलिस प्रशासन कार्य कर रही है वह अपने आप में काबिले तारीफ है और इस प्रकार से कार्य करना अपने आप में किसी पहाड़ तोड़ने से कम नहीं है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह पुलिसकर्मी हमारे समाज के ही अंग हैं और हमारे बीच से ही निकल कर सेवा के लिए कटिबद्ध होते हैं परंतु सरकार और सिस्टम के द्वारा इनका काम के प्रति समय निर्धारण न होना दुर्भाग्यपूर्ण और अमानवीय है जिसको लेकर सरकारी तंत्र को पुनर्विचार करना चाहिए आखिरकार इन्होंने भी मानव रूप में जन्म लिया है।।।

Source: Gorakhpur times