क्या आप अपनी मर्ज़ी से कभी राष्ट्रगान नहीं गाएंगे?

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आज सबसे पहले आपसे एक सवाल,, सिनेमाघरों में फिल्म देखने से पहले राष्ट्रगान के सम्मान खड़े होने से आपमें से कितने लोगों को तकलीफ होती थी  आपमें से कितने लोग ऐसे हैं , जिन्हें राष्ट्रगान की गाने से कठिनाई होती थी दूसरे शब्दों में  क्या आप राष्ट्रगान के लिए तभी खड़े होंगे या तभी राष्ट्रगान गाएंगे जब कानून आपको बाध्य करेगा  क्या आप अपनी मर्ज़ी से कभी राष्ट्रगान नहीं गाएंगे  या उसके सम्मान में नहीं खड़े होंगे सुप्रीम न्यायालय ने सिनेमाघरों में फिल्म प्रारम्भ होने से पहले राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है न्यायालय के इस निर्णय के बाद बहुत से लोगों ने राहत की सांस ली होगी उन्हें ये लग रहा होगा कि अब उन्हें सिनेमा घरों में राष्ट्रगान गाने  उसके सम्मान में खड़े होने की ज़रूरत नहीं है लेकिन ये खुशी बड़ी ख़तरनाक है  इसे शुभ इशारा नहीं माना जा सकता

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सुप्रीम न्यायालय के इस निर्णय का एक मतलब ये भी है कि अब राष्ट्रगान सिर्फ 15 अगस्त, 26 जनवरी सरकारी आयोजनों में ही सुनाई देगा हमारे राष्ट्र में लोग अक्सर ये पूछते हैं कि उन्हें राष्ट्र से क्या मिला लेकिन वो कभी इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उन्होंने राष्ट्र को क्या दिया ? वो अपनी व्यक्तिगत जीवन से राष्ट्रगान के लिए 52 सेकेंड समर्पित करने के लिए भी तैयार नहीं हैं सिनेमाघरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता समाप्त होने के बाद  राष्ट्र की रक्षा करने वाले हमारे जवान ये पूछ सकते हैं कि सब कुछ उनके लिए ही क्यों जरूरी है ? बॉर्डर पर शहीद होना सिर्फ उनके हिस्से में ही क्यों आता है ?

सुप्रीम न्यायालय ने 30 नवंबर 2016 को अपने एक आदेश में सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाने खड़े होकर उसका सम्मान करने को जरूरी कर दिया था सुप्रीम न्यायालय के इस निर्णय पर बहुत बहस हुई कुछ लोगों ने बोला था कि उन पर देशभक्ति थोपी जा रही है विरोध इस बात का था कि देशभक्ति दिखाने के लिए सिनेमा घरों को ही क्यों चुना गया? इस निर्णय पर दोबारा विचार करने के लिए न्यायालय में याचिकाएं भी दाखिल हुई थीं इसके बाद अक्टूबर 2017 में सुप्रीम न्यायालय ने केन्द्र गवर्नमेंट को आदेश दिया था कि वो सिनेमा हॉल  दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर राष्ट्रगान बजाने की नीति खुद तय करें

8 जनवरी केन्द्र गवर्नमेंट ने सुप्रीम न्यायालय में एक Affidavit दाखिल किया  न्यायालय को बताया कि उसने इस मामले में मंत्रियों की एक कमेटी बनाई है, जो 6 महीने में गवर्नमेंट को अपनी रिपोर्ट देगी साथ ही केन्द्र गवर्नमेंट ने सुप्रीम न्यायालय से ये भी आग्रह किया था कि कमेटी की रिपोर्ट आने तक न्यायालय 30 नवंबर 2016 से पहले की यथास्थिति बरकरार रखे यानी सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान का बजाया जाना जरूरी न हो

इसीलिए 9 जनवरी को सुप्रीम न्यायालय ने सिनेमा Halls में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया यानी जब तक केन्द्र गवर्नमेंट की बनाई गई कमेटी अपनी रिपोर्ट देगी तब तक सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना जरूरी नहीं है वैसे राष्ट्रगान का सम्मान दिल से होता है, देशभक्ति की भावना से होता है  इस भावना को दिल में लाने या जागरूक करने के लिए किसी न्यायालय  कानून की ज़रूरत नहीं हैराष्ट्रगान का सम्मान शुद्ध  साफ मन से होना चाहिए देशभक्ति कोई दवा नहीं है  जो इंजेक्शन के ज़रिए बॉडी मन के अंदर पहुंच जाएगी ये सम्मान दिल से आता है, किसी न्यायालय या कानून के दबाव से नहीं इसलिए आज आपको ये तय करना होगा कि आप इस निर्णय से खुश हैं  या फिर इससे दुखी हैं ?

ये भी एक सच्चाई है कि राष्ट्रगान ही वो भावना है, जो आपको देशप्रेम के लिए जागरूक करती है हो सकता है कि बहुत से लोग ये सोच रहे हों  कि वो राष्ट्रगान क्यों गाएं? लेकिन ज़रा सोचिए कि अगर किसी दिन हिंदुस्तान के सैनिकों ने पलटकर ये पूछ लिया कि मैं ही राष्ट्र के लिए शहादत क्यों दूं? तो क्या होगा? क्या सिनेमाघरों में पॉपकॉर्न खाने वाले लोग  जवानों के इस सवाल का जवाब दे पाएंगे ?

राष्ट्रगान पूरे राष्ट्र की आत्मा होता है इसीलिए संसार का हर राष्ट्र अपने राष्ट्रगान का सम्मान करता है ऐसा माना जाता है कि संसार का सबसे पुराना National Anthem. Netherlands का है, जिसे साल 1568 से 1572 के बीच लिखा गया था   साल 1626 के आसपास उसकी धुन तैयार की गई थी इसके बाद संसार के तमाम राष्ट्रों ने अपने अपने National Anthem बनाए  हिंदुस्तान भी इन राष्ट्रों में से एक है हिंदुस्तान के राष्ट्रगान   जन गण मन  की रचना रबिन्द्र नाथ टैगोर ने साल 1911 में की थी उनके इस गीत को 1950 में राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया था

ये गीत  इसकी धुन  हिंदुस्तान के DNA में बसी हुई है आज भी अगर कहीं ये धुन बजती हुई सुनाई दे जाए तो हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति की लहरें उठने लगती हैं लेकिन कुछ लोगों ने इन भावनाओं को भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाने प्रारम्भ कर दिए हैं रबिंद्र नाथ टैगोर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि राष्ट्रगान की रचना के 107 सालों के बाद  हिंदुस्तान में इस बात पर बहस होगी कि राष्ट्रगान बजना चाहिए या नहीं ?  ये मामला सुप्रीम न्यायालय तक पहुंच जाएगा ख़ैर आपके दिल की भावनाओं को अदालतों के चक्कर नहीं लगवाए जा सकते  आप जब चाहें  राष्ट्रगान को अपनी दिनचर्या का भाग बना सकते हैं इसके लिए आपको किसी से Permission लेने की ज़रूरत नहीं है राष्ट्रगान वो डोर है  जिससे पूरा राष्ट्र एकता ज़िम्मेदारी के सूत्र में बंधा रहता है  इसलिए जहां तक हो सके  इस डोर को कसकर पकड़े रहिए आप ऐसा करेंगे  तो देश  किसी भी विध्वंसक सोच का सामना कर लेगा

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Source: Purvanchal media