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6 फ़रवरी- 250 पाकिस्तानियों से अकेले लड़ कर आज ही अमर हुए थे नायक यदुनाथ सिंह…

6 फ़रवरी- 250 पाकिस्तानियों से अकेले लड़ कर

आज ही अमर हुए थे नायक यदुनाथ सिंह जी. नमन करिए उस महानायक को

यद्दपि उनकी पदवी सेना में नायक की थी लेकिन उनके कार्य किसी महानयाक से कम नहीं थे . उन्होंने नायक यदुनाथ सिंह का जन्म 21 नवम्बर 1916 को शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) के गाँव खजूरी में हुआ था। इनके पिता बीरबल सिंह एक किसान थे। यदुनाथ अपने पिता के 8 पुत्रों में से एक थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई गाँव के स्कूल में शुरू तो हुई लेकिन उनका पढ़ाई में मन नहीं लगा। उन्हें तो खेल-कूद का ही जबरदस्त नशा था। वह गाँव में सबकी मदद के लिए हाजिर रहते थे। और जोखिम भरे कारनामे उनका शौक़ था। यदुनाथ में देशभक्ति की भावना बचपन से थी, साथ ही वह हनुमान के भक्त थे और लोग उन्हें ‘हनुमान भक्त’ कहकर बुलाते थे।
हनुमान की तरह ही वह अविवाहित भी रहे।यह वीर गाथा 6 February, 1948 की है l उस दीन प्रात: घना कोहरा के कारण घोर अंधकार और ठंड भी थी l पाकिस्तानी सैनिकसैन्धार गाँव के आसपास के घने जंगलों में से अन्धाधुन्ध गोलियो की बौछार करते हुए हमारी ओर रेंग रहे थे l उनकी मशीन-गन लगातार गोलियाँ दाग रहे थे l लगातार अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलते रहने के कारण हमारे सैनिक चौकी के भीतर ही घीर गये थे l मोर्चा से बाहर वे सिर उठा कर स्थिति का आंकलन भी नही कर सकते थे l नौशेरा की रक्षा के लिए, दुश्मनों को यहाँ सैन्धार गाँव में ही रोकना अत्यावश्यक था l
इस भारतीय चौकी को भीषण आक्रमण का सामना करना था l क्योंकी यह सबसे अगली चौकी थी, और सिर्फ नौ सैनिकों को ही इसकी सुरक्षा करनी थी l इस चौकी की कमान यदुनाथ सिंह के हाँथो में थी l पांच सौ पाकिस्तानी सैनिकों और जन-जातियों ने कई बार भारतीय मोर्चाबंदी को तोड़ने का प्रयत्न कर चुके थे l इस बार वो आगे बद रहे थे, यदुनाथ सिंह ने अपने साथियोँ को चतुरता से व्यवस्तिथ किया l सैनिको को उत्साहित किया और कहा ” हम अपनी अंतिम साँस तक लड़ेंगे l उनके चार सैनिक पहले ही घायल हो चुके थे l फ़िर भी उनके सैनिकों ने, पाकिस्तान के इस आक्रमण को विफल कर दिया l दुश्मन लौट गए l परंतु पाकिस्तान के सैनिको और जन-जातियों लोग फ़िर लौट आए इस बार उनमे अधिक शक्ति से आक्र्माण किया l
पाकिस्तानी सैनिक समझ चुके थे कि, उनका सामना सैनिक से नही बल्कि भारतीय सैनिक से होगा, जिनके अदम्य साहस और द्रिढ-संकल्प के सामने उनकी अधिक संख्या पर भारी पड़ती है l हुआ भी वही, एक बार फ़िर , उन्होने दुश्मन के आक्रमण को विफल कर दिया l इस युद्ध के दौरान नायक यदुनाथ सिंह के साहस और संकल्प शक्ति ने उनके साथियोँ का उत्साहित किया l जज़्बा ऐसा की घायल सैनिकों ने भी सहायता की l उस समय तक उनके सभी सहयोगी सैनिक या तो घायल हो चुके थे या वीरगति को प्राप्त हो गए थे lपाकिस्तान का तीसरा और अंतिम आक्रमण जब हुआ , उस समय तक नायक यदुनाथसिंह के पास कोई नही बचा था, जो उनकी सहायता उन्होने धैर्य नही छोड़ा उनके घाव और दर्द भी उनके देश भक्ति और द्रीढ-इच्छा शक्ति को नही डीगा सकी l वे अपना स्टेन-गन ले कर अपनी चौकी के बाहर निकल आए l
उस समय पाकिस्तान के सैनिक हमारी चौकी से मात्र 15 गज़ की दूरी पर थे l खुले मैदान मे शेर की तरह दहाड़ाते हुए दुश्मनो पर अन्धाधुन्ध गोलियो की बौछार करते हुए बढने लगे l पाकिस्तान के सैनिक, यदुनाथ सिंह की भयानाक गोली-बारी का सामना नही कर सके l पीछे लौट गए l यदुनाथ सिंह पुरी तरह जख्मी हो चुके थे l उनके सिर और सीने में दो गोलियाँ लग चुकी थी l वे युद्धस्थल पर ही गिर पड़े और उन्होने अंतिम साँस ली l वे वीरगति को प्राप्त हुए l

Source: Gorakhpur times