मालदीव में सियासी तूफान ने राष्ट्र में सुनामी का रुख किया अख्तियार

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मालदीव में कुछ दिन पहले उठे सियासी तूफान ने राष्ट्र में इमरजेंसी लागू होने के बाद सुनामी का रुख अख्तियार कर लिया है। सुप्रीम न्यायालय के विपक्षी नेताओं को राजनीतिक मामलों में बरी करने व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल्‍ला यमीन के इस आदेश को मानने से मना करने की पृष्‍ठभूमि में यह संवैधानिक संकट उत्‍पन्‍न हुआ है।Image result for मालदीव में सियासी तूफान ने राष्ट्र में सुनामी का रुख किया अख्तियार

गवर्नमेंट ने सेना से सुप्रीम न्यायालय का आदेश मानने से मना करने को बोला है। हिंद महासागर के इस राष्ट्र के सियासी भूकंप की हलचलें हिंदुस्तान व चाइना तक सुनाई दे रही हैं। दरअसल इन दोनों की इस मौजूदा घटनाक्रम पर निगाहें हैं क्‍योंकि इनके सीधे हित इस राष्ट्र से जुड़े हैं।

राष्‍ट्रपति अब्‍दुल्‍ला यमीन
30 वर्ष तक मालदीव पर शासन करने वाले पूर्व राष्‍ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम के सौतेले भाई हैं। मो नशीद को सत्‍ता से बाहर करने व अब्‍दुल्‍ला यामीन को राष्‍ट्रपति की कुर्सी दिलाने में मौमून की अहम किरदार मानी जाती है। लेकिन सत्‍ता संभालने के बाद यामीन ने मो नशीद समेत विपक्ष के दिग्‍गज नेताओं को राजनीतिक मामलों में कारागार में डाल दिया। उसके बाद 80 वर्षीय मौमून के असर से पूरी तरह से मुक्‍त होने का कोशिश करने के कारण अब्‍दुल्‍ला की उनसे भी नहीं बनी। नतीजतन मौमून को अपने धुर विरोधियों के साथ हाथ मिलाने को मजबूर होना पड़ा। अब्‍दुल्‍ला ने इमरजेंसी लगाने के बाद मौमून को भी अरैस्ट करवा लिया है।

कूटनीतिक विश्‍लेषकों के मुताबिक अब्‍दुल्‍ला ने इमरजेंसी लगाकर अपना आखिरी दांव चल दिया है क्‍योंकि उनके पास इमरजेंसी लगाने के अतिरिक्त कोई विकल्‍प नहीं बचा था। उनके ऊपर पहले से ही लोकतांत्रिक संस्‍थाओं को निर्बल करने व मानवाधिकारों के उल्‍लंघन के आरोप हैं। सुप्रीम न्यायालय के निर्णय ने उनकी निरंकुश सत्‍ता पर लगाम लगा दी है।

दरअसल अब्‍दुल्‍ला यामून को पता है कि यदि पूर्व राष्‍ट्रपति मो नशीद को वह सत्‍ता सौंप देते हैं तो उनके विरूद्ध निश्चित रूप से कार्रवाई होगी। इससे बचने के लिए उन्‍होंने आखिरी दांव चला है। अब सारा दारोमदार सेना पर है। सेना, अब्‍दुल्‍ला यामीन का कितना साथ देती है, ये देखने वाली बात होगी।

भारत की भूमिका
मो नशीद जब मालदीव के लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए पहले राष्‍ट्रपति बने तो हिंदुस्तान ने उनका स्‍वागत किया था। उनके दौर में हिंदुस्तान व मालदीव के संबंध मजबूत हुए। लेकिन नशीद की जब लोकतांत्रिक गवर्नमेंट को अपदस्‍थ किया गया तो कई आलोचकों का कहना है कि हिंदुस्तान ने अपेक्षित रूप से उनका समर्थन नहीं किया। हालांकि ब्रिटेन में निर्वासन का ज़िंदगी व्‍यतीत कर रहे नशीद को पिछले वर्ष हिंदुस्तान ने एक सेमिनार के सिलसिले में हिंदुस्तान बुलाया था। उसके बाद मालदीव के राष्‍ट्रपति अब्‍दुल्‍ला यमीन ने भी हिंदुस्तान की कुछ समय पहले यात्रा की थी। दरअसल अब्‍दुल्‍ला यमीन को यह अहसास थोड़ा बाद में हुआ कि हिंद महासागर में हिंदुस्तान की किरदार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि उसके पहले वह चाइना के करीबी होने की कोशिशों में लगे थे।

अब मौजूदा दशा में हिंदुस्तान बिल्‍कुल नहीं चाहेगा कि मालदीव इस मौजूदा संकट में चाइना की तरफ झुके। इसलिए हिंदुस्तान को अब अपना रुख स्‍पष्‍ट करना पड़ेगा। हालांकि पिछले एक दशक में भारत, मालदीव के अंदरूनी मामलों में हस्‍तक्षेप से सीधे तौर पर बचता रहा है। इसका सीधा लाभ चाइना को मिल रहा है।

चीन की चाल
पिछले सितंबर में मालदीव ने चाइना के साथ मुक्‍त व्‍यापार समझौता किया। मालदीव ने हालिया दौर में चाइना के साथ मैरीटाइम सिल्‍क रूट से जुड़े एमओयू पर हस्‍ताक्षर किए। उसके इस कदमों को हिंदुस्तान से बढ़ती दूरी के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल हिंद महासागर में मालदीव की भौगोलिक स्थिति सामरिक दृष्टि के लिहाज से चाइना के लिए बेहद उपयोगी है। इसलिए वह मालदीव के साथ संबंध मजबूत करने का इच्‍छुक है। कूटनीतिक दांवपेंच के इस खेल में अब हिंदुस्तान के रुख पर सबकी निगाहें हैं।

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Source: Purvanchal media