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जानिए शीतलाष्टमी पर शीतला माता का ये खूबसूरत स्वरुप

कल्चरल डेस्क:चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतलाअष्टमी का पर्व मनाया जाता है। होली के बाद आने वाली अष्‍टमी को शीतला अष्‍टमी मनाने का रिवाज हमारी संस्कृति में माना गया है। कुछ स्थानों पर यह होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार या शुक्रवार को मनाया जाता है। इस दिनों घरों में चूल्हा नही जलाया जाता है। शीतलाअष्टमी से एक दिन पहले ही घरों में कई तरह के व्यंजनों को तैयार कर माता को भोग लगाया जाता है । जहां उत्तर भारत में उन्‍हें माता शीतला के नाम से जाना जाता है वहीं दक्षिण भारत में इनकी देवी पोलरम्‍मा और देवी मारियम्‍मन के नाम से भी पूजा जाता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में भी शीतला अष्टमी का पूजन भी किया जाता है जिसे पोलाला अमावस्या कहते हैं।

दरअसल इस दिन बांसा खाना खाने की परम्परा है। क्योकिं ऐसी मान्यता है कि यह दिन मौसम परिवर्तन का दिन होता है | माँ शीतला को खसरा , माता निकलने , बोदरी आदि रोगों के निजात की देवी माना गया है  इन बीमारियों में ठंडी और बासी चीजे ज्यादा लाभप्रद है | गर्म और छोकन वाली चीजे इन बीमारियों को ज्यादा बढाती है | इसी कारण माँ को एक दिन पहले बनी हुई चीजो का भोग लगाकर उसी दिन यह सब चीजे  हर घरों मे खाई जाती है।

अगर शीतला माता के स्वरुप की बात करें तो माता का स्वरुप आकर्षित करने वाला है शीतला माता चतुर्भुजी हैं जिनके एक हाथ में झाड़ू, दूसरे में कलश है, जबकि तीसरा हाथ वर मुद्रा में और चौथा अभय मुद्रा में रहता है। वे पीला और हरा वस्‍त्र धारण करती हैं। माता की सवारी गधा है। उनके हाथ की झाड़ू सफाई का और कलश जल का प्रतीक है।

दरअसल मां के झाडू से जुड़ी विशेष बात है की  ये अलक्ष्मी व दरिद्रता को दूर करती है । जबकि कलश में धन कुबेर का वास होता है। माता शीतला अग्नि तत्व की विरोधी हैं, अतः इस दिन भोजन घर में चूल्हा नहीं जलता है ।

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Source: Fashion newsera

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