मीडिया स्टिंग: कुछ तुम्हारी अदा का रोना था, कुछ हमें भी खराब होना था

National
संजय भटनागर

एक कोबरा ने कितनों को एक साथ डस लिया। यह कोई नयी बात नहीं है और पहली बार नहीं है। हिंदुत्व के प्रचार प्रसार के लिए विभिन्न मीडिया संस्थानों को खबर के नाम पर अनाप शनाप पैसा देने की पेशकश करने वाले स्टिंग ऑपरेशन के तहत कितनों की पोल खुली। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन के दौरान तो मीडिया के एक वर्ग की जो संदिग्ध भूमिका रही, वह प्रोफेशनल भ्रष्टाचार था लेकिन जो ताजा स्टिंग में सामने आया, वह विशुद्ध  भ्रष्टाचार था।

आजकल का मीडिया, विशेषकर केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद, यूँ भी विश्वसनीयता के गंभीर संकट से गुजर रहा है।  इस स्टिंग के बाद तो मीडिया की गिरती साख पर करेला और नीम चढ़ा की कहावत अक्षरश: लागू हो गयी। विज्ञापन और पेड न्यूज को लेकर मीडिया की  विश्वसनीयता वैसे भी हमेशा से संदेह के घेरे में रही है और यह स्टिंग भी उसी प्रक्रिया का विस्तार मात्र है।

यहाँ समझने वाली बात सिर्फ इतनी सी है कि क्या यह सिर्फ हिंदुत्व के हामी संस्थान तक सीमित है, तो जवाब है नहीं।  राष्ट्रीय मीडिया में किन संस्थानों का दिल भगवान राम के लिए धडक़ता है, यह किसी से छुपा नहीं है लेकिन इससे आगे बढ़ कर इस स्टिंग ने अन्य संस्थानों को एक्सपोज कर दिया।  लेकिन यह भी अर्धसत्य है।

मामला विशुद्ध लालच का, प्रोफेशनल बेईमानी का और भ्रष्टाचार का है। मेरा स्पष्ट मानना है कि अधिकाँश संस्थानों में अगर स्टिंग हिंदुत्व के नाम पर न भी होता तो भी सफल होता क्योंकि उनको पैसे से मतलब है न कि हिंदुत्व से और राम से।  हिंदुत्व के नाम पर तो स्टिंग में तैयार रेसिपी दे दी गयी जिसपर लोग लार टपका बैठे। इस स्टिंग को हिंदुत्व से और सिर्फ हिंदुत्व से जोडऩा सरासर गलत है क्योंकि  भ्रष्टाचार सार्वभौमिक है और जब भ्रष्टाचार की बात होती है तो निष्ठा, प्रोफेशन और प्रोफेशनल उत्कृष्टता पलायन कर जाती है।

तो इस स्टिंग को इस सर्वमान्य सिद्धांत की पुष्टि माना जाये कि समाज की धमनियों में बहने वाले भ्रष्टाचार के रक्त का विस्तार मीडिया में में भी उसी मात्रा में है जितना और कहीं। अब इसमें हिंदुत्व का पुट सिर्फ एक बहाना है, असली मकसद तो तुम्हें भ्रष्ट बताना है। राम न सही, कृष्ण सही, कृष्ण न सही हनुमान सही, मामला जब सिर्फ पैसे का है तो मैं स्पष्ट हूँ कि अगर स्टिंग में लोहिया अथवा अम्बेडकर के नाम पर भी होता तो इतना ही सफल होता। अब थोड़ी जानकारी एकत्र कर ली जाये- जितने  भी महानुभाव इस स्टिंग में नजर आये, इनमे से शायद ही किसी के खिलाफ उनके संस्थानों से एक्शन लिया जा रहा है।  इसके उलट, ये लोग संस्थानों के लिए और अधिक सम्मानित और ‘काम के’ व्यक्ति हो गए हैं।  वैसे हैं सभी पत्रकार, यह स्पष्ट करना आवश्यक है।

चलते चलते एक छोटी सी टिप्पणी -यह तो तमाम चैनल जानते हैं कि उन्होंने पिछले कुछ समय में कितनी न्यूज ब्रेक की है और कितनी नयी न्यूज दीं। सारा ज्ञान घटना घटित होने के बाद ही आता है।

(लेखक न्यूजट्रैक/अपना भारत के कार्यकारी संपादक हैं)

Source: Hindi Newstrack