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आश्रम के वातावरण से बदल गई ज़िंदगी शैली

46 वर्ष पहले असम के दरंग जिले के एक बहुत ही गरीब परिवार में मेरा जन्म हुआ था. जब मैं कठिनसे दो वर्ष का था, मेरे पिता की मौत हो गई. गरीबी की यातनाओं ने मुझे बचपन में ही गुस्सैल स्वभाव का बना दिया. किशोरावस्था में ही मैं उग्रवादी संगठन- उल्फा के असर में आ गया  बारहवीं की इम्तिहान देने के बाद उसकी गतिविधियों से जुड़ गया. मुझे उग्रवादी नेताओं का भरोसा जीतने में वक्त नहीं लगा  जल्द ही मैं उल्फा का क्षेत्रीय मुख्य सचिव बन गया.
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मैं संगठन में अपनी धाक बढ़ा ही रहा था कि 1993 में सेना द्वारा पकड़ लिया गया. एक वर्ष तक कैद में रहने के बावजूद मेरे दिमाग से उल्फा का भूत उतरा नहीं. कारागार से छूटने के बाद मैंने दोबारा उग्रवादी गतिविधियां प्रारम्भ कर दीं. ज्यादा तबाही के लिए इस बार मैंने तीन महीने का विशेष प्रशिक्षण भी लिया. कुछ साल बाद मुझे दोबारा पकड़ लिया गया. इस बार पकड़ने वाले असम पुलिस के जवान थे. यह वही वक्त था, जब कई उग्रवादी समर्पण करके मुख्यधारा में शामिल हो रहे थे.

मुझे एक पुलिस ऑफिसर का योगदान मिला  मैंने भी उस वर्ष पंद्रह अगस्त को सेरेण्डर करने का आधिकारिक निर्णय किया. इसका लाभ मुझे तुरंत मिला  मात्र तीन महीने की कारागार के बाद मुझे बरी कर दिया गया. सेरेण्डर के बदले पुलिस ने मुझसे मेरे पुनर्वास से जु़ड़े अनेक वायदे किए थे.लेकिन मैं आश्चर्यचकित था कि बहुत ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ. इस धोखे से मैं मानसिक रूप से परेशान हो गया.

उग्रवाद छोड़ने के बावजूद समाज में लोग मुझसे डरते थे

उग्रवादी साये के चलते मुख्यधारा के समाज में मेरे लिए अपनी स्थान ढूंढ पाना कठिन हो रहा था.उग्रवाद छोड़ने के बावजूद समाज में लोग मुझसे डरते थे. उनका भय जायज था, कई मौकों पर मेरे जैसे उग्रवादियों की वजह से बेगुनाह व्यक्तियों को भी पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी. सामाजिक अस्वीकार्यता के बावजूद मैंने दोबारा उल्फा से जुड़ने का विचार नहीं किया, क्योंकि मैंने बहुत ईमानदारी से समर्पण किया था. मेरे दिमाग पर दबाव बढ़ता जा रहा था, जिससे राहत ढूंढने के कोशिश में मुझे शराब की लत लग गई.

सालों तक ऐसे ही जिल्लत भरा सिलसिला चलता रहा. एक दिन मेरे ही जैसे एक पूर्व उग्रवादी ने मुझे गवर्नमेंट से अपना हक मांगने की सलाह दी. मैंने आवेदन किया, तो एक लंबे वक्त के बाद मुझे सरकारी लेटर मिला, जिसमें मुझसे मेरे जैसे लोगों की सूची मांगी गई थी. मैंने सब कुछ वैसा ही किया, जैसा मुझसे बोला गया. फलस्वरूप मुझे 220 पूर्व उल्फा सदस्यों के साथ प्रशिक्षण के लिए आर्ट ऑफ लिविंग आश्रम भेजा गया. मुझे उस वक्त भी गवर्नमेंट की मंशा पर संदेह हुआ कि आश्रम में भेजकर हमारा पुनर्वास कैसे होगा? पर मेरी संभावना गलत निकली. आश्रम के वातावरण ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला.

ध्यान आदि की मदद से मैंने न सिर्फ शराब पर काबू पाया, बल्कि मानसिक रूप से इतना मजबूत हो गया कि वापस गांव लौटकर मैंने दूसरों के लिए शिविर का आयोजन किया. लोग मेरा बदला स्वरूप देखकर चकित थे. मगर आज मुझे देखकर कोई चकित नहीं होता है, क्योंकि विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों की मदद से मैं पूरे गांव का चहेता बन गया हूं. उल्फा से जुड़ने के वक्त लोग भय की वजह से मेरा सम्मान करते थे, लेकिन अब मेरे प्रति सम्मान में उनका प्यार देखा जा सकता है.

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Source: Purvanchal media