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कहीं सतुआनी तो कहीं,बिहू या पोइला बैसाख, जानिए इस संक्रांति का महत्व?

जयपुर:मेष संक्रांति साल के सभी 12 संक्रांतियों में खास महत्व का माना जाता है। मेष संक्रांति पर सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इसलिए मेष संक्राति पर सूर्य की पूजा का विधान है। इस माह मेष संक्राति 14 अप्रैल 2018 (शनिवार) को है। मेष संक्रांति को वैशाख संक्रांति के अन्य नाम से भी जाना जाता है। मेष संक्राति के दिन स्नान-दान का विशेष महत्व है। इस दिन अन्न के दान का विशेष महत्व दिया गया है।

मेष संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान करना बेहद पुण्यदायी माना गया है। मेष संक्रांति के दिन पुण्यकाल में स्नान-दान अत्यंत पुण्यदायी होता है। ऐसी मान्यता है कि मेष संक्रांति के दिन संक्रांति से चार घंटे पूर्व और चार घंटे बाद तक पुण्यकाल रहता है।

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 महत्व
इस पुण्यकाल में स्नान-दान और पितरों का तर्पण अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। मेष संक्रांति के दिन सूर्य की उपासना के साथ-साथ गुड़ और सत्तू सेवन करने का भी विधान है। बिहार में इस दिन सतुआनी (सतुआ) के रूप में मानते हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों में मेष संक्रांति को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। ओडिशा में ‘पना संक्रांति’ या ‘महा विषुव संक्रांति’, तमिलनाडु में ‘पुथांदु’, पश्चिम बंगाल में ‘पोइला बैसाख’, आसाम में ‘बोहाग बिहू’ या ‘रोंगाली बिहू’, पंजाब में ‘वैशाख’, केरल में ‘विशु’।

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उत्तराखण्ड में इस पर्व को ‘बिखोती’ के रूप में मनाया जाता है। वहां के लोग एक पत्थर को दैत्य का प्रतीक मानकर डंडों से पीटते हैं। राज्य भर में विभिन्न स्थानों पर विशाल मेले लगते हैं। पारंपरिक नृत्य, गीत और संगीत के साथ बड़ी धूमधाम से यह उत्सव मनाया जाता है।

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Source: Hindi Newstrack

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