रमजान पर विशेष : रोजा हर मुसलमान पर फर्ज जिसमें रोजा रखने की ताकत हो

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सहारनपुर : पवित्र माह रमजानुल मुबारक की इस्लाम धर्म में अलग अहमियत है। रमजान माह के रोजे इस्लाम धर्म का एक अहम रुक्न (भाग) हैं। साथ ही यह महीना दोजख की आग से निजात पाने का भी है। इसलिए मुसलमानों को रमजान के बरकतों व रहमतों वाले महीने में अधिक से अधिक इबादत कर अपने रब को राजी कर लेना चाहिए। यदि 16 मई को चन्द्र दर्शन होते है तो 17 मई को पहला रोजा होगा।
पवित्र माह रमजान का रोजा हर मुसलमान बालिग मर्द व औरत (जिसमें रोजा रखने की ताकत हो) पर फर्ज है। रोजे की शुरूआत हजरत आदम अले. के जमाने से ही हो गई थी। रिवायत से पता चलता है कि आप के दौर में ‘अयामे-बीज यानी हर महीने की तेरहवी, चैदहवी, पंद्रहवी तारीख के रोजे फर्ज थे। यहूद और नसारा भी रोजे रखते थे, यूनानियों के यहां भी रोजे का वजूद मिलता है। हिंदू व बौद्ध धर्म में भी व्रत (रोजा) धर्म का एक हिस्सा है और पारसियों के यहां भी रोजे को बेहतरीन इबादत समझा गया है। इससक सिद्ध होता है कि दुनिया के तमाम धर्मों में रोजे की फजीलत व अहमियत पाई जाती है। हजरत आदम अले. से लेकर मुहम्मद सल्ल. तक हर कौम व समाज में रोजे का वजूद किसी न किसी शक्ल में मिलता है जिससे यह बात साफ हो जाती है कि रोजा एक ऐसी इबादत है जो इस सृष्टि की रचना करने वाले ईश्वर (अल्लाह) को बेहद पसंद है।
देवबंदी उलेमा नदीमुल वजदी बताते हैं कि नबी करीम मोहम्मद सल्ल. की हदीस है जिसने रमजान के रोजे महज अल्लाह के लिए रखे तो उसके सब सगीरा (छोटे) गुनाह बख्श दिये जाएंगे। आप सल्ल. ने एक ओर जगह फरमाया है कि रोजेदार के मुंह की बू अल्लाह के नजदीक मुश्क की खुशबू से भी ज्यादा प्यारी है तथा कयामत के दिन रोजे का बेहद सवाब मिलेगा।
बुखारी शरीफ में रिवायत है कि रोजेदारों के लिए कयामत के दिन अर्श के नीचे दस्तरख्वान लगाया जाएगा और वह लोग उस पर बैठ कर खाना खाएंगे और सब लोग अभी हिसाब में ही फंसे होंगे, इस पर वह कहेंगे कि यह लोग कैसे हैं जो खा पी रहे हैं और हम अभी हिसाब में ही फंसे हुए हैं, उनको जवाब मिलेगा कि ये लोग रोजा रखा करते थे और तुम लोग रोजा नहीं रखते थे। रोजा ही एक ऐसी इबादत है जिसके बारे में खुद अल्लाह तआला का इरशाद है कि ‘रोजे का बदला मैं खुद देता हूं। फरिश्तों का भी माध्यम नहीं होगा। इससे ज्यादा रोजेदार के लिए और क्या खुशी की बात हो सकती है कि वह इसका बदला स्वयं अपने मालिक के हाथों से पाएंगे।
यहूद, नसारा व मुसलमानों के रोजों में है मात्र सहरी का फर्क
रोजा रखने के लिए सहरी खाना (रात के आखिरी हिस्से में कुछ खा लेना) मसनून है, हदीस शरीफ में सहरी की बड़ी फजीलत आई है तथा मुहम्मद सल्ल. का इरशाद है कि यहूद व नसारा (यहूदी और इसाई) और मुसलमानों के रोजों में सिर्फ सहरी का ही फर्क है, यानी वह सहरी नहीं खाते और हम खाते हैं।
आप सल्ल. ने फरमाया कि अल्लाह और उसके फरिश्ते सहरी खाने वालों पर रहमत नाजिल फरमातें हैं, यदि खाने की भूख न हो तो भी इस सुन्नत पर अमल करने के लिए एक दो छुवारे या सिर्फ पानी का एक घूंट पी लेना ही काफी है।

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Source: Hindi Newstrack