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लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में फिर होगा कुछ ‘बड़ा’?

बिहार के स्वास्थ्य मंत्री रहे तेज प्रताप यादव की शादी में उनके पिता राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का अपने धुर विरोधी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से हंसी-खुशी हाथ मिलाना राजनीतिक हलके में चर्चा का विषय है। हालांकि, देखा जाए तो इसमें कुछ नया नहीं। अतिथि और मुख्यमंत्री का स्वागत ऐसे ही किया भी जाना चाहिए। लेकिन, इसी बहाने लोकसभा चुनाव पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। ‘अपना भारत’ उन सभी चर्चाओं को सामने ला रहा है, ताकि पाठक खुद विश्लेषण कर सके कि बिहार में अगले एक साल के अंदर क्या-क्या होने जा रहा है। वैसे, यह तो तय है कि लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में कुछ ‘बड़ा’ जरूर होगा।

शिशिर कुमार सिन्हा
पटना: बिहार में फिलहाल सबसे शांत भारतीय जनता पार्टी ही है, बाकी दलों में कुछ न कुछ खिचड़ी जरूर पक रही है। किसकी खिचड़ी कब पकेगी और उसका स्वाद किसे भाएगा, यह आने वाला वक्त बताएगा। उस वक्त के लिए भी लगता नहीं कि बहुत इंतजार करना है। भारतीय जनता पार्टी को देश चलाने का जनादेश मिले चार साल हो गए हैं। यानी, अब लोकसभा चुनाव में अधिकतम सालभर का समय है। ऐसे में राजनीतिक रूप से उर्वर बिहार में संभावित-आशंकित उथलपुथल देश की राजनीति को नए रास्ते पर ले जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

जनता दल यूनाईटेड : मुसलमानों से करीबी क्यों?
बिहार में मुसलमान वोटरों पर राष्ट्रीय जनता दल का लगभग एकाधिकार है। एक जमाने में इस पर कांग्रेस का एकाधिकार होता था, लेकिन बाद में मुसलमान वोटरों के लिए पहली पसंद लालू प्रसाद यादव बने और अब तक के चुनाव परिणामों में यही कायम दिखे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में राजद के साथ उतरने वाले जनता दल यूनाईटेड को इसका पूरा ज्ञान है। बीच में ही राजद से अलग होकर भाजपा के साथ नीतीश कुमार का आना मुसलमान वोटरों को नहीं भा रहा है, यह भी जदयू अच्छी तरह से जानता है। ऐसे में 15 अप्रैल को पटना के गांधी मैदान में ‘दीन बचाओ, देश बचाओ’ सम्मेलन से जदयू ने मुसलमानों को अपने साथ दिखाने का पूरा प्रयास किया।

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यह सम्मेलन कई मायनों में ऐतिहासिक था। सबसे बड़ी बात कि ‘दीन बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ गांधी मैदान में पहली बार इतनी बड़ी तादाद में मुसलमान जुटे। इसके अलावा इनका शांतिपूर्ण आना और भारत के झंडे के साथ सड़कों पर चलना चर्चा का विषय रहा। बाहर से लोगों को इतना ही दिखा, लेकिन जदयू ने अंदरखाने इस सम्मेलन में कई तीर चलाए। एक तो यह कि भाजपा के साथ सरकार चलाते हुए भी उसने ऐसे सम्मेलन में सक्रियता से अपनी ताकत दिखाई। इस सम्मेलन में जिस मंच से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कई बड़ी बातें कहीं-की, वहीं सत्ता में उनके साथी भाजपा को जो-सो कहा गया। बात यहीं तक नहीं रही। सम्मेलन के बाद मंच संचालक ख़ालिद अनवर को जदयू अध्यक्ष व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधान परिषद का टिकट थमा दिया। वह टिकट जिसपर जदयू के कई पुराने वफादारों का दावा था, अनवर को दिया जाना अपने आप में जदयू की रणनीति को सामने लाता है। उसने भाजपा की नाराजगी तक की चिंता नहीं की।

कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जे के लिए चर्चा में रहे अनवर अमीर-ए-शरीयत के ख़ास हैं। यानी, भविष्य में अगर जदयू नई राह ढूंढ़ता है तो अमीर-ए-शरीयत दो तरह से इस दल के लिए फायदेमंद होंगे। पहला- अमीर-ए-शरीयत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मुसलमानों का रहनुमा घोषित करते हुए अपील कर सकते हैं। दूसरा- अमीर-ए-शरीयत कांग्रेस आलाकमान से करीबी होने के कारण कांग्रेस-जदयू की दूरियां मिटाने में काम आ सकते हैं।

कांग्रेस : राजद अध्यक्ष से अब भी दूरी दिख रही
तेज प्रताप यादव की शादी में आने वाले मेहमानों के नाम से बहुत कुछ साफ होना था और यह हुआ भी। राजद ने अंत समय तक यह भरोसा दिलाए रखा कि राहुल गांधी या प्रियंका गांधी इस समारोह में शामिल होने के लिए आएंगे, लेकिन आए दिग्विजय सिंह। वह भी शादी के मंच पर नहीं, पहले ही आकर औपचारिकता कर गए। सोनिया गांधी और राहुल गांधी काफी पहले से लालू प्रसाद के साथ मंच शेयर करने से बचते रहे हैं, लेकिन इस बार राजद को पूरी उम्मीद थी कि यह दूरियां खत्म हो जाएंगी और राहुल या प्रियंका की उपस्थिति जरूर होगी। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के घर की इस शादी में राहुल-प्रियंका के आने से कांग्रेस-राजद के मजबूत रिश्ते का संदेश मिलता, जो नहीं दिखा। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति से जो संदेश गया, वह राजद के अंदर गहराई तक पहुंच चुका है।

राजद : नई बहू भी भाजपा के खिलाफ मुखर
पूर्व मुख्यमंत्री की पोती और पूर्व मंत्री की बेटी ऐश्वर्या राय के साथ तेज प्रताप यादव की शादी के साथ बिहार में एक नई संभावना यह भी सामने आ रही है कि लालू परिवार भविष्य में बड़ी बहू को राजनीतिक मंच पर खड़ा कर सकता है। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद अलग-अलग घोटालों के मामले में बार-बार जेल यात्रा कर रहे हैं और उनका चुनाव लडऩा भी संभव नहीं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती, बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और छोटे तेजस्वी तक पर अलग-अलग मामलों में आरोप है और कई केंद्रीय एजेंसियां इनसे बार-बार पूछताछ करती रही हैं। ऐसे में बेदाग छवि के लिए ऐश्वर्या राय को अगर राजद अपने मंच पर लाता है तो आश्चर्य नहीं होगा। ऐसी संभावना इसलिए भी सामने आ रही है क्योंकि ऐश्वर्या ट्वीटर के जरिए भाजपा को कोस चुकी हैं।

राजद के पास बिहार में रिकवरी के लिए यह तुरुप का पत्ता हो सकता है, क्योंकि राष्ट्रीय मंच पर फिलहाल उनकी पहुंच कमजोर ही होती दिख रही है। बीमारी के कारण पैरोल पर लालू प्रसाद को अपने बेटे की शादी में आने का मौका मिला, लेकिन उनके पारिवारिक समारोह में एकता दिखाने के लिए भी वामपंथी दलों के किसी राष्ट्रीय नेता ने उपस्थिति नहीं दिखाई। ममता बनर्जी भी नहीं आईं। यूपी से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश डिंपल यादव के साथ तो आए, लेकिन मुलायम सिंह यादव रिश्तेदारी निभाने भी नहीं आए।

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Source: Hindi Newstrack

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