सुप्रीम न्यायालय का अदालतों को फरमान: निर्णय लिखते समय कंजूसी न दिखाएं

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सुप्रीम न्यायालय ने सभी अदालतों से अपील की है कि निर्णय ऐसा लिखा जाना चाहिए कि जीतने वाले पक्ष को जीत का कारण पता चल सके  हारने वाले को पराजय का कारण. उन्हें निर्णय लिखने में किसी तरह की ‘कंजूसी’ नहीं दिखानी चाहिए. न्यायमूर्ति अभय मोहन सप्रे  न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने अपने निर्णय में बोला है कि अदालतों को हर मामले में तार्किक निर्णय देना चाहिए.निर्णय में मामले का तथ्य होना चाहिए. पक्षकारों की दलीलें होनी चाहिए.
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मामले में कानूनी सिद्धांत लागू करने  किन आधारों पर निर्णय किया गया, इसका जिक्र जरूर होना चाहिए. पीठ ने बोला कि निर्णय में इन तथ्यों का अभाव सही नहीं है क्योंकि ऐसे फैसलों में यह पता नहीं चल पाता है कि आखिर एक पक्ष क्यों जीता  दूसरे पक्ष की पराजय क्यों हुई. विस्तृत जानकारी के बिना लिखे फैसलों का कोई औचित्य नहीं है. इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता.

शीर्ष न्यायालय ने मध्य प्रदेश न्यायालय के एक निर्णय पर असहमति जताते हुए यह तल्ख टिप्पणी की है. पीठ ने पाया कि न्यायालय की पीठ ने बिना तार्किक विश्लेषण, बिना आधार बताए  दोनों पक्षों की दलीलों पर गौर किए बिना निर्णय लिया. मामला प्रदेश की एक कंपनी द्वारा अपने कुछ कर्मचारियों के खाते में कम भविष्य निधि (पीएफ) जमा करने से संबंधित है. इस पर केंद्रीय न्यासी बोर्ड ने कंपनी को ब्याज सहित पीएफ की रकम जमा करने का आदेश दिया था. इस फैसला को कंपनी ने ईपीएफ अपीलीय न्यायाधिकरण को चुनौती दी.

न्यायाधिकरण ने कंपनी के हक में निर्णय देते हुए केंद्रीय न्यासी बोर्ड के आदेश को दरकिनार कर दिया. इसके बाद बोर्ड ने न्यायाधिकरण के आदेश को न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन न्यायालय ने उनकी अपील खारिज कर दी. न्यासी बोर्ड ने सुप्रीम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. बोर्ड के एडवोकेट दुष्यंत पाराशर की ओर से दलील दी गई कि न्यायालय को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए था.

साथ ही उन्होंने बोला कि बिना कोई तर्क और आधार बताए न्यायालय ने निर्णय दे दिया. सुप्रीम न्यायालय ने उनकी दलीलों को स्वीकार करते हुए बोला कि न्यायालय ने बिना न्यायिक दिमाग लगाए निर्णय दिया है. लिहाजा सुप्रीम न्यायालय ने मामले को दोबारा न्यायालय के पास भेजते हुए नए सिरे से याचिका पर गौर करने के लिए बोला है.

Source: Purvanchal media