मुंशी प्रेमचंद जयंती 31 जुलाई विशेष- रोजमर्रा की जिंदगी में जिंदा हैं मुंशी प्रेमचंद

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पूर्णिमा श्रीवास्तव

कबीरदास कहते हैं, हम न मरैं मरिहें संसारा, हम कूं मिल्या जिवावनहारा।
अब न मरौं मरनै मन मानां, तेई मुए जिन राम न जाना। कबीर की चंद लाइनें

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद पर सटीक बैठती हैं। प्रशासन से लेकर सरकारें भले ही कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद से जुड़ी यादों को लेकर संजीदा न हों लेकिन आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में वह जिंदा दिखते हैं। बात चाहें मुंशी प्रेमचंद की रचानाओं पर शोध की हो या फिर उनके साहित्य के विक्री की, वह अन्य रचनाकारों से कहीं आगे नजर आते हैं।

दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के शोध छात्र लक्ष्मी वर्मा ने प्रो कमलेश कुमार गुप्ता के निर्देशन में प्रेमचंद की कहानियों में ‘प्रेमचंद की कहानियों में पारिवारिक जीवन’ विषय पर शोध प्रबंध जमा किया है। लक्ष्मी वर्मा इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में भविष्य का समाज दिखता है। सामाजिक ताने-बाने को शब्दों में पिरोने के जादूगर प्रेमचंद पारिवारिक संबंधों से लेकर सहजीवन सरीखे विषयों पर संदेश देते हैं। प्रेमचंद की कहानियों में परिवार के विविध रुप दिखाई देते हैं। सास-बहू और बेटा से लेकर सहजीवन तक के विषयों पर प्रेमचंद की कहानियां संदेश देती हैं। प्रो.कमलेश कहते हैं कि कहानी ‘गृहनीति’ में प्रेमचंद ने सास-बहू के संबंधों की दिक्कतों को ही नहीं नहीं उकेरा है बल्कि समाधान भी बताया गया है। प्रो.अनिल राय के निर्देशन में कुछ दिनों पहले ‘शब्द की संस्कृति से ज्ञान, अनुभूति और संवेदना की तलाश’ विषय पर हुए शोध में भी रिश्तों की चिंता में प्रेमचंद समाधान देते नजर आते हैं। प्रो.राय कहते
हैं कि दादी की चिंता को चिमटे तक पहुंचाने का दम प्रेमचंद के शब्द संसार में दिखता है। प्रो.सदानंद शाही के निर्देशन में पांच शोध हुए हैं।

प्रो.शाही कहते हैं कि प्रेमचंद की कहानियों में भारतीय समाज की जड़ता भीतर तक दिखती है। छुआछूत, लैंगिक विषमता, जातिवाद जैसे गम्भीर विषयों पर वह न सिर्फ हस्तक्षेप करते हैं बल्कि समाधान भी बताते दिखते हैं। मुंशी प्रेमचंद के साहित्यकर्म को लेकर साहित्यकार प्रो रामदेव शुक्ल कहते हैं कि यथार्थ में भविष्य को देखने की क्षमता का प्रदर्शन प्रेमचंद के साहित्य में दिखता है। ईदगाह, गोदान, पूस की रात सरीखी कहानियों में भारतीय समाज की जड़ताओं को उन्होंने बेहतर चित्रण किया है। उनके उपन्यासों में मध्यवर्ग से लेकर किसान के जीवन का चित्रण दिखता है। दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो चितरंजन मिश्र का कहना है कि प्रेमचंद पर बेहतर काम हो रहा है। लेकिन सच यह भी है कि प्रेमचंद पाठ्यक्रम के मोहताज नहीं हैं। उनके साहित्य की बच्चों से अधिक बड़ों को जरुरत है। उनका साहित्य जनता का है, किसान का है। आम लोगों की आवाज उनके साहित्य में शब्द-शब्द दिखती है। निदेशक, प्रेमचंद साहित्य सस्थान प्रो.सदानंद शाही का कहना है कि उपन्यास यूरोप की विधा है। प्रेमचंद ने भारतीय परिवेश में उपन्यास लिखा। देवी-देवताओं के साहित्य के उलट प्रेमचंद ने किसान, मध्यवर्ग, साधारण नागरिकों के लेखक नजर आते हैं। उनके साहित्य में सामज की जड़ताएं न सिर्फ दिखती हैं बल्कि उन जड़ताओं को दूर करने का समाधान भी दिखता है।

डीडीयू के हिन्दी विभाग के शोध छात्रों के पंसदीदा लेखक हैं प्रेमचंद। प्रेमचंद के साहित्य पर डीडीयू में 50 से अधिक शोध प्रबंध पूरे हो चुके हैं। डीडीयू के हिन्दी विभाग महाकवि तुलसीदास के बाद सर्वाधिक शोध कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद पर हुए हैं। प्रेमचंद का छात्रों से लगाव ही है कि जब डीडीयू में पाठ्यक्रम को बाहर करने की कोशिशें हुईं तो खूब विवाद हुआ।
करीब डेढ़ दशक पहले डीडीयू के हिन्दी विभाग में मुंशी प्रेमचंद कोर्स से बाहर भी हुए थे। तब प्रेमचंद के नाटक कर्मभूमि की जगह पर भीष्म साहनी के तमस को शामिल किया गया था। विरोध और विवाद के बाद प्रेमचंद को दोबारा पाठयक्रम में शामिल किया गया था।

गोरखपुर में बसती हैं प्रेमचंद की सांसें
आधुनिक हिंदी के निर्माताओं में प्रमुख प्रेमचंद के जीवन के अनेक पड़ावों का साक्षी रहा है गोरखपुर। बचपन में प्रेमचंद के भीतर साहित्यिक संस्कार विकसित करने में इस शहर की भूमिका रही है। किस्सागोई की फितरत तब और मजबूती से आगे बढ़ी जब वह नौकरी के सिलसिले में गोरखपुर आये। 1916 से 1921  तक का समय प्रेमचंद के जीवन का सबसे अहम था। इसी दौर में वे हिंदी गद्य का खजाना भरने की ओर मुखातिब हुए। यहीं उन्हें मन्नन द्विवेदी गजपुरी और
फिराक गोरखपुरी जैसे सहयोगी मिले। स्वदेश के संपादक दशरथ प्रसाद द्विवेदी और महावीर प्रसाद पोद्दार जैसा प्रकाशक मिला। प्रेमचंद की कथायात्रा के अनेक पात्र भी यहीं मिले।

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जिंदगी के किताब के अहम पन्ने गोरखपुर के इर्दगिर्द घूमता है। गांधी के आह्वान पर सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर पूर्णकालिक लेखक बनने का निर्णय भी उन्होंने यहीं लिया था। महात्मा गाॅधी की प्रेरणा से वह स्वाधीनता आन्दोलन में कूद पड़े थे। मुंशी प्रेमचंद  पहली बार 1892 में गोरखपुर आये थे। तब उनके पिता अजायब लाल यहां डाक विभाग में तैनात हुए थे। प्रेमचन्द ने यहां के रावत पाठशाला और मिशन स्कूल से आठवीं तक की शिक्षा ग्रहण की। इसी दौरान उन्हें साहित्य का चस्का लगा और वे लेखन की ओर प्रवृत्त हुए। दूसरी बार वे नौकरी  के सिलसिले में गोरखपुर आए और 19 अगस्त 1916 से 16 फरवरी 1921 तक यही रहे। वह दीक्षा विद्यालय में सहायक अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे थे। उन्होंने यहां रहते हुए महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों का सृजन किया। यह दौर राष्ट्रीय आन्दोलन की दृष्टि से ही नहीं वरन प्रेमचन्द के जीवन का भी महत्वपूर्ण समय था। इसी समय प्रेमचन्द उर्दू से हिन्दी की ओर आए। देश की आजादी की लड़ाई के दौरान 8 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी का गोरखपुर के गाजी मियां के मैदान में भाषण हुआ था। गांधी जी का भाषण सुनने प्रेमचन्द पत्नी व बेटों के साथ गए थे। गांधी जी के भाषण से प्रभावित होकर उन्होंने 15 फरवरी 1921 को सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। तीन दिन बाद वह यहां से वाराणसी चले गए।

मुंशी प्रेमचंद जयंती 31 जुलाई विशेष- रोजमर्रा की जिंदगी में जिंदा हैं मुंशी प्रेमचंद

साहित्यकार रविन्द्र श्रीवास्तव उर्फ जुगानी भाई कहते हैं कि मुंशी प्रेमचंद को गोरखपुर से इतर सोचा भी नहीं जा सकता है। वह भले ही वाराणसी के लमही में पैदा हुए लेकिन उनके साहित्य की कर्मभूमि गोरखपुर ही बनी। प्राथमिक शिक्षा तुर्कमानपुर के रावत पाठशाला में हुई तो पहाड़पुर की गलियों में उनका बचपन गुजरा। गोरखपुर में ही उन्हें पहली नौकरी मिली, पहला पुत्र पैदा हुआ और यहीं महात्मा गांधी के भाषण से प्रभावित होकर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। गोरखपुर में उन्होंने नमक का दारोगा, गुल्लू डण्डा, ईदगाहऔर रामलीला जैसी कालजयी रचनाओं को लिखा। शहर से लगाव ही है कि उनके साहित्य में गोरखपुरियत की झलक साफ दिखती है। यहीं नहीं उनकी कहानी, नाटक और उपन्यास के तमाम पात्र इसी गोरखपुर की उपज
हैं।

कर्मभूमि पर ही उपेक्षित है मूर्ति
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद अपनी कर्मभूमि गोरखपुर में ही उपेक्षित हैं। उनके नाम पर बने पार्क के ठीक सामने 28 माह से बोरी में लिपटी रही उनकी  मूर्ति भले ही बेपर्दा हो गई हो लेकिन वह उपेक्षा के इंतहा की गवाही दे रही है। यहीं नहीं गोरखपुर विश्वविद्यालय में गोरखनाथ पीठ, कबीर पीठ की स्थापना के बीच प्रेमचंद पीठ में बीते 21 सालों से किसी प्रोफेसर की तैनाती नहीं होने से कोई काम नहीं हो रहा है। 17 जनवरी, 1989 को तत्कालीन केन्द्रीय संचार मंत्री वीर बहादुर सिंह के प्रयासों के जीडीए ने मुंशी प्रेमचंद पार्क को जनता को समर्पित किया था। स्व.बीर बहादुर सिंह ने ही उनकी आदमकद मूर्ति का अनावरण किया था। प्रतिमा के अनावरण के लिए प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी आई थीं। 1996 में प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने प्रेमचंद निकेतन से प्रेमचंद पुस्तकालय और साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियाँ शुरू कीं। तब इतिहासकार प्रो हरिशंकर श्रीवास्तव की प्रेरणा से इस प्रतिमा की तलाश शुरू हुयी वर्ष 1996 में जीडीए ने पार्क के कुछ
कमरों और देखरेख की जिम्मेदारी प्रेमचंद साहित्य संस्थान को सौंप दी गई। पार्क में भित्तिचित्र से उनकी कहानियों के पात्रों का चित्रण भी किया गया।


प्रेमचंद के जन्मशती वर्ष 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय में प्रेमचंद पीठ स्थापित करने की बात कही थी। तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो शांता सिंह और सुप्रसिद्ध आलोचक परमानद
श्रीवास्तव के प्रयासों से 1990 में गोरखपुर विश्वविद्यलय में प्रेमचंद पीठ स्थापित हुई। पीठ की जिम्मेदारी प्रो. परमानंद श्रीवास्तव दी गई। उनके कार्यकाल तक प्रेमचंद पीठ सक्रिय रही। प्रो.श्रीवास्तव ने पांच वर्षों में सिर्फ प्रेमचंद पर ही शोध कराया। प्रेमचंद और भारतीय उपन्सास पर बड़ा आयोजन भी हुआ। लेकिप 1995 में प्रो. परमानद श्रीवास्तव के अवकाश
ग्रहण करते ही प्रेमचंद पीठ को भी ग्रहण लग गया। पिछले इक्कीस वर्ष से पीठ के लिए किसी प्रोफेसर की तैनाती नहीं हुई है। प्रो सदानंद शाही का मानना है कि प्रेमचंद जिस जाति व्यवस्था की खिलाफत की उसी जातिवाद की सनक
के चलते उनका अपमान हो रहा है। प्रेमचंद संस्थान से जुड़े अशोक चैधरी कहते हैं कि गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रेमचंद पीठ की विदाई इसलिए हुयी कि वे वर्ण आधारित समाज के विरोधी थे। प्रेमचंद प्रतिमा विवाद इसलिए हुआ कि
उन्हें एक खास जाति से जोड़कर देखने का संकीर्ण रवैया अपनाया गया।

उपेक्षित हैं मुंशी प्रेमचंद से जुड़े स्थल
प्रेमचंद मुंशी प्रेमचंद की प्राथमिक शिक्षा गोरखपुर के तुर्कमानपुर के रावत पाठशाला में हुई थी। विद्यालय की दरो दिवार पर उनके पढ़ने का जिक्र तक नहीं है। यहां कक्षाओं से लेकर कार्यालयों में दो दर्जन से महापुरुष की तस्वीरें हैं, लेकिन प्रेमचंद की एक भी फोटो नहीं लगी है। गोरखपुर विकास प्राधिकरण द्वारा विकसित मुंशी प्रेमचंद पार्क में प्रेमचंद के
कहानियों के पात्रों की भित्ति चित्र और पुस्तकालय में रचनाओं का संग्रह सकून देता है लेकिन विवादों के चलते मुख्य गेट पर उनकी बदहाल मूर्ति उनके चाहने वालों को झकझोरती है। वहीं नार्मल स्कूल में भी खण्डहरों के बीच आज
की युवा पीढ़ी को प्रेमचंद की तलाश है। गोरखपुर में दूसरी बात मुंशी प्रेमचंद बतौर शिक्षक गोरखपुर आए थे। तब नार्मल स्कूल में पढ़ाते थे। लेकिन आज की पीढ़ी को बताने के लिए यहां कुछ नहीं है। जिस स्कूल में वह पढ़ाते थे, उसकी दीवार खण्डहर सरीखी दिखती हैं। नार्मल परिसर में ही एक प्राथमिक पाठशाला है। वहां मौजूद एक शिक्षिका दावा करती है कि परिसर में विशालकाय चितवन के पेड़ के नीचे बने चबुतरे पर बैठ कर ही प्रेमचंद ने
ईदगाह की रचना की थी।

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Source: Hindi Newstrack