ईसाई समुदाय को प्रार्थना की अनुमति, कुछ गलत करें तो प्रशासन कर सकता है कानूनी कार्रवाई

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इलाहाबाद : कौशाम्बी के बिरमर और अहलादपुर गांव में कुछ लोगों को रविवार की प्रार्थना करने की अनुमति दिये जाने के मामले में हाईकोर्ट ने कहा है कि याचीगण प्रार्थना कर सकते हैं। मगर जिला प्रशासन इसकी निगरानी करेगा। यदि कोई भी गैर कानूनी कार्य होता है, तो प्रशासन नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है।

कोर्ट ने दोनों पक्षों को प्रार्थनासभा की वीडियोग्राफी करने के लिए कहा है। अदालत ने कहा है कि याचीगण को ईसाई समुदाय की मान्यता के अनुसार प्रार्थना करने से रोका नहीं जा सकता है। रोशनलाल और कई अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश मुख्य न्यायाधीश डी.बी.भोसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ ने दिया। कोर्ट के आदेश पर कौशाम्बी के डीएम और एसपी अदालत में उपस्थित हुए।

प्रशासन का कहना था कि प्रार्थना की मांग करने वाले ईसाई नहीं है। प्रार्थना सभा की आड़ में वहां गैरकानूनी कार्य हो रहे हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि प्रशासन सभा की निगरानी करे और यदि कोई अनुचित कार्य हो रहा है तो नियमानुसार कार्रवाई कर सकते हैं।

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राजेंद्र स्टील के पूर्व निदेशक के प्रत्यर्पण कार्यवाही की जानकारी तलब

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मेसर्स राजेंद्र स्टील कंपनी कानपुर के पूर्व निदेशक डीके बत्रा के अमेरिका से प्रत्यर्पण के संबंध में की गयी कार्यवाही की रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के सचिव से दस अगस्त को कार्यवाही रिपोर्ट के साथ हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

सीबीआई के अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश ने कोर्ट को बताया कि गृह मंत्रालय ने पत्रावली विदेश मंत्रालय को सौंप दी है। शीघ्र ही आगे की कार्यवाही की जायेगी।

यह आदेश न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्र ने सती राम यादव व अन्य की अर्जी की सुनवाई करते हुए दिया है। मालूम हो कि कंपनी के समापन के बाद निदेशक ने कंपनी की सम्पत्तियों को अवैध रूप से बेंच दिया या दूसरे को कब्जा दे दिया। इस पर कोर्ट ने सीबीआई को जांच कर कार्यवाही का आदेश दिया। निदेशक अमेरिका में रह रहा है, जिसके चलते जांच पूरी नहीं हो पा रही है। इस पर कोर्ट ने सीबीआई की विशेष अदालत को आदेश जारी करने को कहा है। इसी के तहत प्रत्यर्पण कार्यवाही की जा रही है।

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भर्ती में प्रदेश की महिला को ही आरक्षण को चुनौती, सुनवाई तीन अगस्त को

अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की कृषि विभाग के कनिष्ठ अभियंताओं की भर्ती में चयन परिणाम घोषित होने के बाद प्रदेश की ही महिलाओं को आरक्षण का लाभ देने की वैधता चुनौती याचिका की सुनवाई जारी है। अगली सुनवाई तीन अगस्त को होगी।

उत्तराखंड व बिहार की वर्षा सैनी व नौ अन्य याचियों की याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र कर रहे हैं। याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एन त्रिपाठी ने बहस की कि याचिकाओं का चयन किया गया और बाद में 2007 के शासनादेश के तहत किया गया कि बीस फीसदी आरक्षण केवल उप्र की निवासी महिलाओं को ही दिया जायेगा। इसके बाद याचियों को आरक्षण का लाभ देने से वंचित कर दिया गया। अनुच्छेद 16(3) के तहत निवास के आधार पर कानून बनाने का अधिकार केन्द्र सरकार को ही है। राज्य सरकार इस संबंध में निवास के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर सकती।

त्रिपाठी ने कहा कि देश की संघीय व्यवस्था के तहत एकल नागरिकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2002 में राजस्थान में अध्यापकों की नियुक्ति में जिले का निवासी होने की शर्त को असंवैधानिक ठहराया है। दस अंक अधिक देने का नियम बनाया था। ऐसे ही तेलंगाना के लोगों को ही नौकरी देने को रद्द कर दिया। सरकार की तरफ से कहा गया कि अनुच्छेद 15(3) में सरकार को महिला आरक्षण तय करने का अधिकार है। शासनादेश वैध है, सुनवाई जारी है।

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Source: Hindi Newstrack