कैंब्रिज से शुरू हुई एनआरसी ड्राफ्ट के खिलाफ मुहिम

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असम के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर अब विदेशों में भी विरोध शुरू हो गया है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के कुछ बुद्धिजीवियों ने एनआरसी मसौदे खिलाफ आवाज उठाई है। उनकी इस ऑनलाइन पीटिशन की मुहिम को दुनियाभर के नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, लेखकों और फिल्ममेकर्स का समर्थन मिल रहा है। उनका कहना है कि इन 40 लाख ‘अवैध’ लोगों में से अधिकांश अशिक्षित, गरीब और लाचार हैं और वे एनआरसी पीड़ितों के साथ एकजुटता से खड़े हुए हैं।

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फेमस बुक राइटर मृणालिनी सिन्हा ने भी दिया समर्थन
असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के फाइनल ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों के नाम शामिल न किए जाने पर सड़क से लेकर संसद तक संग्राम मचा है। एनआरसी ड्राफ्ट के खिलाफ कैंब्रिज यूनिवसिर्टी से शुरू हुई इस मुहिम https://petitionagainstthenrc.wordpress.com को हाल ही में शुरू किया गया है। यही नहीं इस ऑनलाइन पीटिशन को अभी तक दुनियाभर के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के 700 से ज्यादा प्रोफेसर, लेखकों, फिल्मकार और स्टूडेंट्स समर्थन दे चुके हैं। इसे समर्थन देने वालों में मिशिगन यूनिवसिर्टी में इतिहास की प्रोफेसर और जानीमानी लेखिका मृणालिनी सिन्हा भी हैं। पीटिशन के मुताबिक दुनियाभर के शिक्षाविद, एक्टिविस्ट और सांस्कृतिक कार्यकर्ता इस मसौदे का विरोध करते हैं और मानते हैं कि एनआरसी में कोई भी ‘अवैध’ नहीं है।

1985 में असम अकॉर्ड में नहीं है एनआरसी का जिक्र 

पीटिशन को समर्थन देने वाली दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशाष्त्र की प्रोफेसर नबानिपा भट्टाचार्यजी खुद शिलांग की रहने वाली हैं और उन्होंने वहां के इतिहास पर काम किया है। उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर पुनर्विचार याचिका दायर होनी चाहिए। उनका कहना है कि 1985 में असम अकॉर्ड में एनआरसी का कोई जिक्र नहीं था। केंद्र सरकार, असम सरकार, आसू और एएजीएसपी के बीच असम अकॉर्ड समझौता हुआ। वहीं एनआरसी का जिक्र 2005 में आया, हालांकि 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐक्ट को बेकार बताते हुए रद्द कर दिया।

सरकार ने बरबाद किए 1300 करोड़ 
नबानिपा ने सवाल उठाया कि अगर सरकार उन्हें वापस बंग्लादेश नहीं भेज सकती तो, सरकार ने जनता के पैसे से 1300 करोड़ रुपए क्यों खर्च किए। उन्होंने कहा कि यह सरकार का फैल्योर है, जिसका नतीजा 40 लाख लोगों को भुगतना पड़ा है। जब बंग्लादेश उन्हें अपना नागरिक मानता ही नहीं तो सरकार कैसे उन्हें बंग्लादेशी ठहरा सकती है।

वोटिंग अधिकार छीनने की साजिश 
वहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसर और स्टूंडेट्स भी एनआरसी ड्राफ्ट के खिलाफ हैं। इस पीटिशन को साइन करने वाले जवाहरलाल नेहरू यूनिवसिर्टी में समाजशास्त्र के  एसोसिएट प्रोफेसर तनवीर फजल का कहना है कि सरकार ने एनआरसी ड्राफ्ट ला कर 40 लाख लोगों को स्टेटलैस घोषित कर दिया है। उन्होंने कहा कि अभी तो सरकार ने केवल एक राज्य में किया है, अगर बाकी राज्यों में अगर ऐसा करते हैं, तो भयावह हालात पैदा हो जाएंगे। गरीब मजबूर लोग कहां से अपनी नागरिकता और पुरुखों से संबंधित दस्तावेज पेश कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि यह लोगों से उनके वोटिंग अधिकार छीनने की साजिश है।

बढेगी बेरोजगारी 
फजल ने कहा कि सरकार के इस कदम से देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा और देश में बेरोजगारी बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि बंग्लादेश के साथ सरकार की डिपोर्टेशन को लेकर संधि नहीं है, ऐसे में सरकार 40 लाख लोगों का कैसे प्रबंधन करेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भाजपा राष्ट्रीय दल हैं, उन्हें छोटे-छोटे मुद्दों में उलझने की बजाए इसका हल निकालने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहल करनी चाहिए।

‘अतिथि देवो भव’ परंपरा को भूले
‘कजरिया’ और ‘मेरे ख्वाबों में जो आए’ जैसी बॉलिवुड फिल्मों बना चुकी मधुरिता आनंद भी इस पीटिशन का समर्थन करती हैं। उन्होंने कहा कि यह देश के लिए शर्म और दुर्भाग्य की बात है कि ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा को भूल गए। हम उस देश से हैं, जो दलाई लामा को भी शरण देता है। लेकिन राजनीतिक वजहों से मानवता को ताक पर रखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि वह देश के राजनीतिज्ञों से एक सवाल पूछना चाहती हैं कि पूरे देशभर में सड़कों पर बच्चे भीख मांग कर रहे हैं, राजनीतिज्ञों को वह नजर नहीं आते क्योंकि वे उनके वोट बैंक नहीं हैं। उन्होंने कहा एनआरसी मुद्दे पर वे भी देशव्यापी ऑनलाइन पीटिशन शुरू करने वाली हैं और कोशिश रहेगी कि 40 लाख लोगों के समर्थन में कम से कम 4 लाख भारतीय पीटिशन साइन करें, जिसे वे सरकार के पास भेजेंगी।

एनआरसी पर क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने  
गौरतलब है कि असम पब्लिक वर्क एनजीओ समेत कई दूसरे संगठनों ने 2013 में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और 2018 जुलाई में फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने असम ड्राफ्ट से बाहर 40 लाख लोगों पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल रोक लगाई है। देश में असम ही अकेला राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है। असम में 1985 से लागू असम समझौते के मुताबिक, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक असम में प्रवेश करने वाले लोग और उनकी अगली पीढ़ी को भारतीय नागरिक माना जाएगा।

Source: Purvanchal media