‘बबुआ’ सरकार की 3 स्वप्निल परियोजनाओं के निर्माण में लापरवाही उजागर, बरसात नहीं झेल पा रहे ये भवन

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लखनऊ: पूर्व प्रदेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव की तीन स्वप्निल परियोजनाओं में लापवाही की पोल बरसात ने खोल दी है। आलमबाग बस टर्मिनल , जे पी एनआईसी और विद्युत् नियामक आयोग भवन की छतें अपने निर्माण के बाद की पहली बरसात भी नहीं झेल पा रहीं। निर्माण का यही मानक अगर अंग्रेजो के कार्यकाल में रहा होता तो देश की दशा क्या होती ?

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अंग्रेजो के जाने के सौ साल बाद भी उनके समय में बने भवन और पुल अभी बिना किसी क्षति के चल रहे हैं लेकिन अत्याधुनिक तकनीक और मानक पर कैसे जाने के बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने अपनी स्वप्निल परियोजनाओं के निर्माण में भी हद दर्जे की लापवाही होने दिया है। यह हालत आधुनिक राजनीति और उसके विकास के दावों की पोल खोल कर रख  देती है। खास बात तो यह है कि इनमे से दो परियोजनाओं का ठेका शालीमार के पास था जबकि एक राज्य निर्माण निगम के पास।

समाजवाद का प्रतीक जे पी एनआईसी

सबसे पहले बात करते हैं समाजवादी सरकार के सबसे बड़े समाजवादी प्रतीक के रूप में स्थापित लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम पर बनाये गए जे पी अंतर्राष्ट्रीय केंद्र के भवन की। 45 करोड़ की लागत आयी है इसके संग्रहालय के निर्माण पर।

हर जगह टपक रहा है पानी

समाजवादी चिंतक जयप्रकाश नारायन की जिंदगी और चिंतन को प्रदर्शित करने के लिए बने इस म्यूजियम को सपा सरकार में बनाया गया था।बेसमेंट में मुख्य बीम पर जहां पानी का रिसाव हुआ है वहीं इमारत की छतों और बीम पर दूसरी जगह भी पानी टपक रहा है। लिफ्ट एरिया में भी दीवारों पर पानी का रिसाव हो रहा है।

किसी अनहोनी के नहीं होने देने के लिए लिफ्ट को अगले आदेश तक बंद करा दिया गया है। टपक रहे पानी को इकट्ठा करने के लिए म्यूजियम में बाल्टियां तक लगानी पड़ गई हैं। लिफ्ट नहीं चलने की वजह से लोगों के लिए प्रथम तल और इससे ऊपर का म्यूजियम का हिस्सा दर्शकों के लिए भी बंद कर दिया गया है।

सब कुछ बंद

म्यूजियम का निर्माण शालीमार कंपनी ने कराया है। वहीं इसका डिजाइन और म्यूजियम में प्रदर्शनी बनाने का काम आर्कओम आर्किटेक्ट ने तैयार किया। म्यूजियम को 2016 के अंत में शुरू किया गया था। म्यूजियम में लगी प्रदर्शनी बंद है। थाली बजाओ आंदोलन से लेकर समाजवाद की सोच को दिखाने वाली डायनामिक बॉल्स तक थम चुकी हैं। मौजूद स्टाफ ने बताया कि  बेसमेंट में पानी भर रहा है। ड्रेनेज सिस्टम ठप हो गया है।

एलडीए ने शुरू की जांच

लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष पीएन सिंह ने इसकी जांच राइट्स से कराने को कहा है।उनका मानना है कि म्यूजियम में पानी टपकने और मुख्य बीम तक पानी आना गंभीर मामला हैै। इसकी जांच एलडीए विशेषज्ञ संस्था राइट्स से कराने जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के प्रभारी आनंद मिश्रा ने बताया कि बीते दिनों 72 घंटे से अधिक समय से जारी बारिश में काफी नुकसान म्यूजियम की इमारत में दिख रहा है।

आलमबाग बस टर्मिनल का भी  बुरा हाल

अब बात करते हैं एक अन्य स्वप्निल परियोजना आलमबाग बस टर्मिनल की। यहाँ की हालत भी जेपी एनआईसी जैसी ही है। अभी हाल ही में इस टर्मिनल का उद्घाटन हुआ था। शालीमार ग्रुप ने जब सीएम योगी आदित्यनाथ से बस टर्मिनल का उद्घाटन कराया था, उस दौरान यहां वर्ल्ड क्लास सुविधाएं देने का दावा किया गया था।

लेकिन महीने भर बाद ही बस अड्डे की गुणवत्ता की पोल खुलने लगी है। पहली बारिश में एक जगह फाल्स सीलिंग का एक हिस्सा गिर गया तो वहां अफरातफरी मच गई। इतना ही नहीं छत से कई जगहों पर पानी टपकने की वजह से यात्रियों को दिक्क्तों का सामना करना पड़ रहा है।

टर्मिनल की स्टेशन इंचार्ज पूनम उज्जवल तैयार कर रहीं रिपोर्ट 

इस मामले में बस टर्मिनल की स्टेशन इंचार्ज पूनम उज्जवल रिपोर्ट तैयार कर रही हैं। बतौर पूनम बस अड्डे के टॉइलेट्स के कई दरवाजे बंद नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने बताया कि दावों की संख्या की तुलना में चौथाई गार्ड्स भी अब ड्यूटी नहीं कर रहे हैं। स्टेशन इंचार्ज ने बताया कि कई खामियां अब तक उजागर हो चुकी हैं। जिसकी रिपोर्ट एमडी को भेजी जाएगी।

विद्युत् नियामक आयोग भवन की छत ही ढह गयी 

तीसरी परियोजना है विद्युत् नियामक आयोग भवन की। इसकी कहानी सब बदतर है क्योकि यह परियोजना अपनी मूल लागत से दुगुनी कीमत में बनी है। खबर है कि उद्घाटन के महज डेढ़ महीने में उप्र विद्युत नियामक आयोग के नवनिर्मित भवन के कोर्ट रूम की छत ही ढह गई।

इसमें कोई घायल नहीं हुआ लेकिन राजकीय निर्माण निगम के खराब गुणवत्ता की पोल जरूर खुल गई। यह हाल तब है जब इस भवन के निर्माण की लागत भी इंजीनियरों ने लगभग दो गुना बढ़ा दिया। उद्धाटन मौके पर उप राष्ट्रपति वैंकेया नायडू  और राज्यपाल राम नाईक ने भी देरी और बजट बढ़ोतरी पर सवाल उठाते हुए गुणवत्ता की जांच की बात कही थी।

‘स्टेट आफ आर्ट’ डिजाइन और निर्माण के तौर पर पेश किया जा रहा था भवन  

गोमतीनगर के विभूतिखंड में बने इस भवन को ‘स्टेट आफ आर्ट’ डिजाइन और निर्माण के तौर पर पेश किया जा रहा था लेकिन इस  घटना के बाद से इसके निर्माण की गुणवत्ता पर ही प्रश्नचिह्न लग गए। हालांकि राजकीय निर्माण निगम से हस्तांतरण नहीं हुआ है इसलिए अभी जिम्मेदारी निर्माण निगम की है। नियामक आयोग के अध्यक्ष की ओर से निर्माण निगम को इस संबंध में जानकारी दी गई है। हालांकि राजकीय निर्माण निगम इस मामले में कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है।

गुणवत्ता पर सवाल, जांच-परख कर लेंगे भवन

नियामक आयोग के सचिव संजय श्रीवास्तव ने कहा कि अब भवन की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लग गए हैं। इसलिए अब पूरी तरह गुणवत्ता की जांच परख करने के बाद ही भवन का हस्तांतरण किया जाएगा। भवन अभी राजकीय निर्माण के ही अधिकार में है, इसलिए वह इसकी मरम्मत करेंगे।

उद्घाटन के समय ही उपराष्ट्रपति और राज्यपाल ने उठाये थे सवाल

उपराष्ट्रपति ने अफसरों को नसीहत देते हुए कहा कि रेगुलेशन या नियमों का होना बहुत अच्छा है लेकिन यह काम में बाधा डालने के लिए नहीं बल्कि काम को सुगम बनाने के लिए होना चाहिए। काम के लिए रिश्वत लेने-देने पर भी उपराष्ट्रपति ने कटाक्ष करते हुए साफ किया कि सरकार को सब पता है। राज्यपाल ने कहा कि सितम्बर 2014 में इस भवन का शिलान्यास मैंने किया।

तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव से पूछा कि क्या यह तय समय दो वर्ष में पूरा हो जाएगा तो उन्होंने आश्वासन दिया लेकिन यह समय से पूरा नहीं हो सका। तीन वर्ष आठ माह लग गए पूरा होने में और लागत भी 18.70 करोड़ से बढ़कर 35.70 करोड़ यानि लगभग दो गुनी हो गई। इससे बचा जा सकता है। टाइम ओवर रन और कॉस्ट ओवर रन पर रोक लगनी चाहिए। इसकी जांच होनी चाहिए कि इसमें देरी क्यों हुई और लागत क्यों बढ़ी।

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Source: Hindi Newstrack